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स्वाधीनता।


सामाजिक हक रखता हूं। यदि किसी आदमी के सामाजिक बर्ताव से मेरे सामाजिक हक मारे जॉय, तो नागरिक होने के आधार पर, मैं उस बर्ताव के बन्द करने के लिए कानून बनाने का हक रखता हूं"। अब आपके "सामाजिक हक" की परिभाषा सुनिए। "यदि किसी बात से मेरे सामाजिक हक में वाधा आती हो तो अत्यन्त नशीली शराब की बिक्री से जरूर आती है। समाज में रहकर मेरा मुख्य हक रक्षा अर्थात् हिफाजत है। मुझे इस बात का हक है कि मैं समाज से अपनी हिफाजत कराऊंं और समाज को मुनासिब है कि वह मेरी हिफाजत करे। पर शराब की बिक्री से समाज में अक्सर अव्यवस्था पैढ़ा होती है और उस अव्यवस्था को उत्तेजना मिलती है। इससे मेरी सुरक्षितता, मेरी हिफाजत, जाती रहती है। जितने सामाजिक हक हैं, सब लोगों के लिए बराबर होने चाहिए। अर्थात् सब लोग सामाजिक बातों के बराबर हकदार हैं―उनसे सबको बराबर फायदा होना चाहिए। शराब का व्यापार मेरे इस बराबरी के हक में भी बाधा डालता है, क्योंकि, समाज में दुर्गति पैदा करके वह उससे खुद तो फायदा उठाता है; पर दुर्गति या दुर्दशा में पड़े हुए आदमियों की परवरिश के लिए मुझे अधिक कर देना पड़ता है। मुझे इस बात का भी हक है कि मैं अपनी नैतिक और बुद्धिविषयक बातों में, जहां तक चाहूं, उन्नति करूं। पर शराब का रोजगार मेरे इस हक में भी बाधा डालता है। क्योंकि उससे समाज की नीति या सदाचरणशीलता कम हो जाती है अथवा बिलकुल ही बिगड़ जाती है। इससे मैं स्वतंत्रता-पूर्वक औरों की सङ्गति नहीं कर सकता और बिना सङ्गति के जो फायदे मुझे उनके पास बैठने उठने से होने चाहिए वे नहीं होते, यद्यपि उन फायदों के उठाने का मुझे पूरा हक है। शराब की बिक्री के कारण मुझे इस बात का हमेशा डर लगा रहता है कि जिनका सहवास मैं करता हूं वे कहीं शराबी तो नहीं हैं; उन की संगति से कहीं मैं भी तो शराबी न हो जाऊंगा और कहीं मेरा भी आचरण तो न खराब हो जायगा"। खूब! इस तरह के सामाजिक हकों की कल्पना, आज तक शायद ही किसी ने ऐसे साफ शब्दों में जाहिर की हो। इससे यही अर्थ निकलता है कि हर आदमी जिस बात को वह अपना कर्तव्य समझता है उसे, एक एक करके बाकी के सब आदमियों से, अपनी समझ के अनुसार, ठीक ठीक करा लेने का पूरा हकदार है। अतएव वह कह सकता है कि जिस।