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चौथा अध्याय।

नीति के विषय में, अर्थात् उन बातों के विषय में जो दूसरों से सम्बन्ध रखती हैं, बहुमत से निश्चित की गई समाज की राय जो दो एक दफे गलत होती है तो दस पांच दफे सही भी होती है। क्योंकि ऐसी दशा में समाज को सिर्फ अपने ही फायदे का खयाल रहता है। अर्थात् उसको सिर्फ इस बात पर ध्यान देना पड़ता है कि यदि अमुक बर्ताव करने की स्वतंत्रता लोगों को मिल जायगी तो उससे समाज की हानि होगी या लाभ। परन्तु आत्म-विषयक बातों में, अर्थात् उन बातों के विषय में जिनका सम्बन्ध दूसरों से नहीं है, यदि समाज, बहुमत के बल पर, दस्तंदाजी करेगा तो उससे भूल होने की उतनी ही सम्भावना है जितनी न होने की है। क्योंकि, इस दशा में, दूसरों के लिए कौन बात अच्छी है और कौन बुरी है, इस पर कुछ आदमियों की जो राय होगी वही समाज की राय समझी जायगी। समाज की राय का अधिक से अधिक इतना ही अर्थ हो सकेगा। परन्तु बहुत दफे समाज की राय का इतना भी अर्थ नहीं होता। क्योंकि सब लोग जिसके बर्ताव की निन्दा करते हैं उसके सुख और सुभीते की वे बिलकुल ही परवा नहीं करते। परवा ये सिर्फ अपनी करते हैं। वे सिर्फ इस बात को देखते हैं कि अमुक तरह का बर्ताव हमको पसन्द है या नहीं; या उससे हमारा फायदा है या नुकसान। बहुत से आदमी यह समझते हैं कि और लोगों के जो बर्ताव उनको पसन्द नहीं है उनसे उनकी जरूर हानि होगी। अतएव यदि कोई उस तरह का बर्ताव करता है तो वे, यह समझकर कि इसने हमारे मनोविकारों को चोट पहुँचाई, बेतरह बिगड़ खड़े होते हैं। एक धर्म्मान्ध आदमी से किसी ने पूछा कि क्यों तूने दूसरों के धर्म्म-सम्बन्धी मनोविकारों की निन्दा करके उनके दिलको दुखाया? इसे सुनकर उसने कहा कि इन लोगों ने भरने गर्हित धर्म्म और पूजन-पाठ से मेरे दिल को दुखाया—इसी लिए मैंने ऐसा किया। यही दशा उन लोगों की है जो भिन्न मनोविकार रखनेवालों को नहीं देख सकते। पर इन लोगों के ध्यान में यह बात नहीं आती कि निजकी राय के विषय में किसीके जो मनोविकार होते हैं उनमें, और उस राय को बुरा समझनेवालों के मनोविकारों में जरा भी समता नहीं है। दोनों में आकाश-पाताल का अन्तर है। रुपये की थैली उड़ा लेजाने की इच्छा रखनेवाले चोर के, और उसे बड़ी होशियारी से सन्दूक के भीतर रख छोड़ने की इच्छा रखनेवाले उसके मालिक