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चौथा अध्याय

की कोई हानि नहीं होती, अथवा यदि होती भी है तो उनकी सम्मति चकी कोई हानि नहीं होती, अथवा यदि होती भी है तो उनकी सम्मति से होती है, वहां इस तरह का प्रश्न ही नहीं हो सकता। पर हां, जिन आद- मियों का इस तरह के वर्ताव से सम्बन्ध हो, अर्थात् जो खुद सम्मति दें, या औरों से लें, उनका वयस्क और मामूली तौर पर सज्ञान होना बहुत जरूरी बात है । समाज और कानून दोनों को चाहिए कि इस तरह का बर्ताव कर- ने और उसका जो परिणाम हो उसे भोगने के लिए वे हर आदमी को पूरी आजादी दें।

यदि कोई कहे कि यह सिद्धान्त स्वार्थ से भरा हुआ है। इसमें परोपकार की तरफ बिलकुल ही ध्यान नहीं दिया गया; इससे यह भासित होता है कि आदमियों को एक दूसरे के बर्ताव से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है; और यदि अपने हित की कोई बात न हो तो परस्पर एक दूसरे के हित और सदाचार की तरफ ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है तो यह उसकी बहुत बड़ी भूल है । दूसरों के हित-दूसरों के कल्याण-की वृद्धि करने के लिए निस्वार्थ भाव से यत्न करने की बहुत बड़ी जरूरत है । ऐसे यत्न- ऐरले श्रम-को कम करने की अपेक्षा बढ़ाना चाहिए और खूब बढ़ाना चाहिए । परन्तु सब लोगों के मन को अपने अपने हित की तरफ प्रवृत्त करने की इच्छा यदि किसी उदार और निष्काम बुद्धि के आदमी के हृदय में उत्पन्न हो तो उसे सच्चे अथवा लाक्षणिक चाबुक को छोड़कर और उपायों से काम लेना चाहिए। यह नहीं कि हाथ हिलाने ही से वह इस काम को कर सवे । और भी ऐसे साधन हैं जिनसे यह काम अच्छी तरह हो सकेगा। बादमी में खुद अपने हित के लिए जो सद्गुण होने चाहिए उनकी कीमत मैं पर नहीं समापता । दूसरों के हित के लिए जो सद्गुण होने चाहिएं उनले में इन प्यक्ति-विषयक गुणों की कीमत थोड़ी ही कम समझता हूं। मैं यह सीरता से नहीं कह सकता कि इनकी कीमत थोडी भी कम है। सुमकिन है दोनों की कीमत बराबर हो । शिक्षा का काम है कि वह इन . दोनों प्रकार के गुणों की उन्नति करे । अर्थात् लोगों को ऐसा शिक्षण मिले दि. उनमें स्वार्थ और परार्ध दोनों गुणों की वृद्धि हो । पर शिक्षा भी दो तरीके से दी जाती है:-एक समझा दुझाकर और शिक्षा से जो लाभ होते हैं रन पर लोगों का विशास जमाकर; दूसरे जबरदस्ती से । शिक्षा प्राप्त पर की उस यदि निकर गई हो तो स्वार्थ और परार्थ से सम्बन्ध रखने-