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तीसरा अध्याय

आदमी सर्वज्ञ नहीं है। उससे गलती हो सकती है। वह जिस बात को जैसा समझता है उसमें सत्य का सर्वांश बहुधा नहीं रहता, अर्थात् उसमें सत्य का कुछ ही अंश रहता है। बिना पूरे तौर पर, और बिना किसी प्रतिबन्ध के, परस्पर विरोधी मतों की तुलना किये किसी बात में एकता का होना अच्छा नहीं। और जब तक आदमी सत्य को सब तरह से जानने के—उसके सब अंशों को पहचानने के—योग्य, इस समय की अपेक्षा अधिक न हो जायँ, तब तक जुदा जुदा मतों का होना बुरा नहीं, अच्छा ही है। ये ऐसे प्रमाण हैं, ये ऐसे सिद्धान्त हैं कि इनके आधार पर जिस तरह मत प्रकट करना युक्तिसंगत सिद्ध हो चुका है उसी तरह अपने अपने मत के अनुरूप बर्ताव करना भी सिद्ध है। जब तक आदमी पूर्णता को नहीं पहुंचता—जब तक आदमी कमालियत को नहीं हासिल कर लेता—तब तक जैसे हर आदमी को अपना अपना मत जुदा जुदा प्रकाशित करने देने में लाभ है वैसे ही हर आदमी को अपनी अपनी समझ के अनुसार जुदा जुदा काम करने देने में भी लाभ है। हर आदमी को इस बात का आधिकार होना चाहिए कि जो काम उसे पसन्द हो करे; दूसरों को तकलीफ न पहुंचाकर जिस तरह का आचरण वह करना चाहे करे; और जिस तरह के व्यवहार या बर्ताव में उसे अपना लाभ जान पड़े उसे करे। यदि किसीको इस बात की जांच करने की इच्छा हो कि जुदा जुदा तरीके से रहने में क्या हानि और क्या लाभ है तो वह खुशी से उन सब तरीकों की जांच करे और तजुरबे से उन बातों को जाने। मतलब यह कि जिन बातों से दूसरों का सम्बन्ध नहीं है उन्हें करने के लिए हर आदमी स्वतन्त्र है। जहां आदमी अपने इच्छानुसार बर्ताव नहीं कर सकता, किन्तु और लोगों की चालढाल और रूढ़ि के अनुसार उसे बर्ताव करना पड़ता है, वहां समझना चाहिए कि मनुष्य के सुख की एक बहुत बड़ी चीज कम है। यह चीज समाज अर्थात् सब आदमी, और व्यक्ति अर्थात् जुदा जुदा हर आदमी—दोनों के—सुख-साधन का प्रधान तत्त्व है। पर ऐसी जगह उसीकी कमी रहती है।

इस तत्त्व को संभालने में—इस बात का प्रतिपादन करने में—एक बहुत बड़ी कठिनाई आती है। वह यह कि लोग व्यक्ति-विशेष की योग्यता और उसके महत्त्व की बहुत ही कम परवा करते हैं। यदि वे परवा करें तो उस योग्यता या महत्त्व को पाने के उपाय भी सहज ही में हो सकें। उपाय ढूंढ