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दूसरा अध्याय।


तरह काम में ला भी नहीं सकते। और, यदि वे इनसे काम लें भी तो उलटी उन्हींकी हानि हो―अर्थात् दूसरों की व्यर्थ निन्दा करने से उनका निर्वाह न हो सके। इसलिए, मामूली तौर पर जो मत प्रचलित मतों के विरुद्ध हैं उन्हींके अनुयायियों को वाद-विवाद की सीमा के भीतर रहना चाहिए―उन्हींको नियमित और परिमित विवेचना का अभ्यास करना चाहिए। तभी लोग उनकी बातों को शान्तिपूर्वक सुनेंगे। तभी लोग उनकी दलीलों पर गौर करेंगे। उनको इस बात की हमेशा खबरदारी रखना चाहिए कि उनके मुंह से कोई ऐसा शब्द या वाक्य न निकल जाय जो किसीको नागवार हो। इस विषय में जरा भी बेपरवाही उनसे हुई―जरा भी असावधानी उन्होंने की―कि उनकी हानि हुई। इस हालत में वे हानि से कभी नहीं बच सकते। इधर प्रचलित मत के अनुयायियों ने यदि बेहिसाब गाली गलौज से काम लिया तो लोग नया मत स्वीकार करने से डरते हैं और उस मत के पक्षपातियों की बातें और विवेचना सुनने का साहस भी नहीं करते। इससे यदि लोगोंकी यह इच्छा हो कि जो बात सत्य और न्याय्य है उसीकी जीत हो तो दुर्बल पक्ष का प्रतिबन्ध करने की अपेक्षा प्रबल पक्ष का प्रतिबन्ध करने की ही बहुत अधिक जरूरत है। दुर्बल दलवालों को गालियों और व्यर्थ कलङ्कों से बचाने के लिए प्रबल दलवालों ही को रोकना अधिक न्यायसङ्गत है। उदाहरण के लिए धार्म्मिकता की अपेक्षा अधार्म्मिकता पर ही होनेवाले व्यर्थ आक्रमणों का रोकना अधिक जरूरी है। पर, यह निर्विवाद है कि इस विषय में दोनों में से किसी पक्ष को भी अपने विरोधी पक्ष का अटकाव करने के लिए कानून या हुकूमत की शरण जाना अनुचित है। अर्थात् अधिकार और कानून के जोर से किसी तरह का अटकाव या प्रतिवन्ध करना मुनासिब नहीं है। जो मामला जैसा हो―जो बात जैसी हो―उसकी सब हालतों का अच्छी तरह खयाल करके समाज को उसका फैसला करना चाहिए। जिसकी विवेचना में―जिसके वादविवाद में―फिर चाहे वह जिस पक्ष का हो, अप्रामाणिकता, द्वेष, दुरावह, हठ और दूसरे के मत के विषय में असहनशीलता देख पड़े समाज को उसे ही दोषी ठहराना चाहिए। इस तरह किसीको अपराधी ठहराने के लिए समाज को इस बात पर ध्यान न देना चाहिए कि अपराध करनेवाला आदमी किस पक्ष का है। चाहे वह अनुकूल पक्ष का हो चाहे