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समझने लगा। दिल बहलाने के लिए वह इतिहास और काव्य भी पढ़ता था और कभी कभी कविता भी लिखता था। पोप का किया हुआ 'इलियड' का भाषान्तर उसे बहुत पसन्द आया। उसे देख कर वह छोटी छोटी कवितायें लिखने लगा। इससे मिल को शब्दों का यथास्थान रखना आ गया। पद्य-रचना के विषय में मिल के पिताने पुत्र की प्रतिकूलता नहीं की। यह काम उसकी अनुमति से मिल ने किया।

मिल को अपनी हमजोली के लड़कों के साथ खेलना कूदना कभी नसीब नहीं हुआ। उसने अपना आत्मचरित अपने हाथसे लिखा है। उसमें एक जगह वह लिखता है कि उसने एक दिन भी 'क्रिकेट' नहीं खेला। लड़कपन में यद्यपि वह बहुत मोटा, ताजा और सबल नहीं था; तथापि वह इतना दुबला और शक्तिहीन भी न था कि उसके लिखने पढ़ने में बाधा आती। जब वह तेरह वर्षका हुआ तब उसके बाप ने उसे विशेष गम्भीर विषयों की शिक्षा देना आरम्भ किया। ग्रीक, लैटिन और अँगरेजी भाषाओं में तत्त्वविद्या और तर्कशास्त्र पर अनेक पुस्तकें उसने पढ़ डालीं। उसका बाप रोज बाहर घूमने जाया करता था। अपने साथ वह मिलको भी रखता था। राहमें यह उससे अनेक प्रश्न करता जाता था। जो कुछ वह पढ़ता था उसमें वह उस की रोज परीक्षा लेता था। जो चीज बाप पढ़ाता था उसका उपयोग भी वह पुत्रको बतला देता था। उसका यह मत था कि जिस चीज का उपयोग मालूम नहीं उसका पढ़ना ही व्यर्थ है। तर्कशास्त्र अर्थात् न्याय, और तत्त्वविद्या अर्थात् दर्शनशास्त्र, में मिल थोड़े ही दिनों में प्रवीण हो गया। किसी ग्रन्थकार के मत या प्रमाणको कुबूल करने के पहले उसकी जाँच करना मिल को बहुत अच्छी तरह आ गया। दूसरों की प्रमाणशृंखलामें वह बड़ी योग्यता से दोष ढूंढ़ निकालने लगा। यह बात सिर्फ अच्छे नैयायिक और दार्शनिक पण्डितों ही में पाई जाती है। क्योंकि प्रतिपक्षी की इमारत को अपनी प्रवल दलीलों से ढहाकर उसपर अपनी नई इमारत खड़ा करना सब का काम नहीं। खण्डन मण्डन की यह विलक्षण रीति मिलको लड़कपन ही में सिद्ध हो गई। इसका फल भी बहुत अच्छा हुआ। यदि थोड़ी उम्र में ही उसकी तर्कशक्ति इतनी प्रबल न हो जाती तो वह वयस्क होने पर इतने अच्छे ग्रन्थ न लिख सकता। मिल के घर उसके पिता से मिलने अनेक विद्वान् आया करते थे। उनमें परस्पर अनेक विषयों पर वाद-विवाद हुआ करता था। उनके कोटिकमको मिल ध्यानपूर्वक सुनता