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स्वाधीनता।

सर्वतोभाव से सच हैं—पूरे तौर से सही हैं। अथवा यों कहिए कि सत्य का सर्वांश उनमें कभी ही नहीं। इससे विरोधी मतों की परस्पर रोंकझोंक होने से ही सत्य के शेष अंश के मिलने की आशा रहती है।

तीसरा—मान लीजिए कि रूढ़ मत, अर्थात् प्रचलित राय या बात, ठीक है। यही नहीं, किन्तु यह भी मान लीजिए कि वह सब तरह से सच है; उसका सर्वांश सत्य है उसका कोई अंश भ्रान्तिमूलक नहीं। तोभी यदि वह मत प्रकट न किया जायगा और उसके विपक्षी, दिल खोल कर, खूब उत्साह के साथ उसका विरोध न करेंगे तो वह मत एक दुराग्रह की तरह एक हठवाद की तरह—लोगों के मन में लीन रह जायगा। उसकी उपयोगिता, उसकी सयौक्तिकता, उसकी सत्यता का कभी अनुभव न होगा। वह बात कभी उनकी समझमें अच्छी तरह न आवेगी।

चौथा—यही नहीं, किन्तु वाद-विवाद और विवेचना न होने से किसी भी मत, राय या बात के असली अर्थ के कमजोर होजाने या उसके बिलकुल ही भूलजाने का डर रहता है और आदमियों के आचार, विचार और व्यवहार पर उसका जो परिणाम होना चाहिए वह धीरे धीरे जाता रहता है। इस दशा में उस मत की जो मोटी मोटी बात होती हैं—जो विशेष विशेष वचन होते हैं—सिर्फ वही याद रह जाते हैं। उनसे कोई फायदा नहीं होता; उनकी हितकारिणी शक्ति जाती रहती है; परिणाम में अच्छा फल देने की उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है। उस मत की नियमावली का—उसके वचनों का—मन के ऊपर सिर्फ बोझ मात्र लदा रह जाता है। और, तजरुबा और समझ के बल से सच्चे और मनोनीत विश्वास के जमने में बहुत अधिक बाधा आती है।

कुछ आदमियों की राय है कि जिसका जो मत हो उसे प्रकाशित करने के लिए उसको पूरी स्वतन्त्रता होनी चाहिए; परन्तु उसके प्रकाशन का प्रकार—उसके जाहिर करने का तरीका—परिमित होना चाहिए। उसमें तीव्रता का होना अच्छा नहीं। उसमें वाद-विवाद करने की सीमा का उल्लंघन होना अच्छा नहीं। अतएव विचार और विवेचना की स्वाधीनता का विषय समाप्त करने के पहले इन लोगों के मत की भी मैं समालोचना करना चाहता हूं। अब यह देखना है कि विवाद की सीमा कहां पर और कैसे नियत करना चाहिए। किस जगह तक न जाने से सीमा का उलंघन