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दूसरा अध्याय।


आज कल जिस तरह की बुद्धि और जिस तरह की विवेचनाशक्ति है उसके रहते, सत्यता के सब अंशों से जानकारी होने के लिए सिर्फ एक ही मार्ग है। वह मार्ग सतभिन्नता है। किसी भी विषय में दुनिया भरकी प्रायः एक राय होने पर भी यदि उसके प्रतिकूल कोई कुछ कहना चाहे, फिर चाहे सारी दुनिया का पक्ष ठीक ही क्यों न हो, तो भी उसे बोलने देना चाहिए। क्योंकि यह बहुत सुमकिन है कि अपने पक्ष के समर्थन में वह कोई ऐसी बात कहे जिससे दूसरे पक्षवालों का फायदा हो और जिसे न करने देने से सत्यका थोड़ा बहुत नुकसान हो जाय।

इस पर कोई यह आक्षेप कर सकता है कि-"कुछ रूढ़, अर्थात् प्रचलित, बातें-विशेष करके बड़े बड़े और आवश्यक विषयों से सम्बन्ध रख. नेदाली-ऐसी हैं जिनमें सत्यता पूरे तौरपर पाई जाती है। यह नहीं कि उनका कुछ अंश सच हो और कुछ झूठ। उदाहरण के किए क्रिश्चियन-धर्म की नीति को देखिए। नीतिसम्बन्धिनी सत्यता की उसमें जरा भी कमी नहीं है। उस सत्यता का पूरा अंश उसमें विद्यमान है। यदि कोई आदमी उस नीति के विरुद्ध किसी तरह की नीति सिखलाने लगा, या उसके विरुद्ध किसी तरह का उपदेश देने लगा, तो वह बहुत बड़ी गलती करेगा। उसकी नीति बिलकुल ही भ्रामक होगी।" यह एक ऐसी बात है जो प्रतिदिन के व्यवहार से बहुत ही अधिक सम्बन्ध रखती है। इस लिए यह दृष्टान्त सब से अधिक महत्त्वका है। जिस सिद्धान्त का वर्णन मैंने किया है उसकी कसौटी में कसकर, योग्यता या अयोग्यता की जांच करने के लिए, इससे अधिक अच्छा दृष्टान्त और नहीं मिल सकता। इसलिए मैं इसे अपनी सिद्धान्त-रूपिणी कसौटी पर कसना चाहता हूं। परंतु निश्चियननीति की जांच करने के पहले, इस बात का फैसला बहुत जरूरी है कि निश्चियन-नीति से मतलब क्या है-क्रिश्चियन नीति कहते किसे हैं? किश्चियन-नीति से यदि नई धर्मापुस्तक (New Testment) में कही गई नीति से मतलब है तो जो आदमी उस पुस्तक को पढ़ कर उस नीति का ज्ञान प्राप्त करेगा उसे शायद ही इस बात की कल्पना होगी कि नीति से सम्बन्ध रखनवाली जितनी बातें या जितने तत्त्व हैं वे सभी उस पुस्तक में हैं; अथवा यह कि नीतिविषयक सब सिद्धान्तों को पूरे तौर पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रीति से लिखलाने के लिए ही उसकी उत्पत्ति हुई है।