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दुसरा अध्याय।


था । और रूसो के मतों में जितना भ्रम था प्रचलित मतों में उससे बहुत कम था । पर बात यह थी कि रूढ़ मतों में सत्य के जिस अंश की कमी थी वही अंश रूसो के मतों में खून अधिक था और उसी अंश की जरूरत भी लोगों को खूब अधिक थी । इसीसे मतप्रवाह में पड़कर वह बह चला और धीरे धीरे सब लोगों तक पहुंच गया । जब रूसो के मतरूपी महानद की बाढ़ उतर गई तब लत्य का अंश नीचे रह गया । बाकी जो कुछ था वह सब बह गया । रूसो का मत था कि सीधा सादा, अर्थात् सरल, वर्ताव सब से अच्छा होता है और समाज के बनावटी बन्धन और दाम्भिक आचारवि-चारों से नीति नष्ट या क्षीण हो जाती है । इन बातों को उसने लोगों के मन में इतना गंस ठांस कर भर दिया कि उनका प्रभाव आज तक सुशिक्षित आदमियों के हृदय में पहले ही की तरह जागृत है । तब से वह संस्कार पूर्ववत् वैसा ही बना हुआ है । उसका नाश नहीं हुआ । इन कल्पनाओं का नतीजा बहुत अच्छा होगा और किसी समय वह देख भी पड़ेगा । परन्तु अब वह समय नहीं है कि सिर्फ बातूनी जमाखर्च से काम निकला सके । इल समय इन कल्पनाओं का-इन बातों का-प्रतिपादन भी करना चाहिए और इनके अनुसार काम भी करना चाहिए । अर्थात् सिर्फ मुँह से कहना ही न चाहिए, करके दिखलाना भी चाहिए ।

राजनैतिक विषयों में भी यह वात पाई जाती है । राजनीति से सम्बन्ध रखनेवाले जो लोग हैं उन्होंने एक सामान्य सिद्धान्त यह निश्चय किया है कि राजसत्ता को अच्छी हालत में रखने के लिए दो पक्षों की जरूरत है- एक रक्षक या स्थिर पक्ष, दूसरा सुधारक या संशोधक पक्ष । अर्थात् एक ऐसा पक्ष होना चाहिए जिसकी राय यह हो कि जो कुछ है उसे ही वना रखना चाहिए; और दूसरा पक्ष ऐसा होना चाहिए जिसकी राय यह हो कि जो कुछ हैं उससे आगे बढ़ना चाहिए-उसकी उन्नति करना चाहिए । इन दोनों पक्षों की तब तक जरूरत रहती है जब तक इनमें से कोई एक पक्ष इतना प्रवल न हो जाय कि स्थिरता और सुधार, इन दोनों, के गुण उसमें आजाय । अर्थात् उसे यह मालूम होने लगे कि उस समय उसकी हालत है उसके ख्याल से कौन सी बातें छोड़ देने और कौनसी वैसे ही बनी रखने के लायक हैं । इस हालत को पहुँचने तक दो पक्षों का होना बहुत ही जरूरी है । क्योंकि दोनों में कोई न कोई दोष जरूर होते हैं । अतएव हर-