पृष्ठ:स्त्रियों की पराधीनता.djvu/२७४

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लोगों के सब अपकृत्य उसके अधिकार में आगये। क़ानून का ज़ोर समाज के अनाथों और निर्बलों की रक्षा कर सकता है। जो अत्यधिक बलवान् हैं वे मनचाहा अत्याचार नहीं कर सकते। आज-कल निर्बलों की यह दशा नहीं हो जाती कि उन्हें बलवान् जिलावे तो वे जीवें और मारना चाहे तो मरें। इस समय भी वीरकाल की उदार कल्पना की ख़ूबियाँ हैं, और उस के सौन्दर्य्य में पहले से ज़रा भी कमी नहीं हुई है। बल्कि इस समय जो सुधार हुआ है उस में निर्बलों के अधिकारों की विशेष रक्षा की गई है और मनुष्यों की स्वस्थता तथा शान्ति इस समय ज़ियादा मज़बूत है। यदि इस सुधार में कोई कलङ्क है तो वह पराधीनता का विवाह-बन्धन ही है।

१०—पुरुषों के नैतिक व्यवहार पर स्त्रियों की इच्छाओं का जो प्रभाव पड़ता है वह इस ज़माने में कम नहीं हुआ है; किन्तु इसका स्वरूप पहले के समान सच्चा और निश्चित नहीं रहा, क्योंकि यह सत्ता भी लोकमत में मिल गई है। पुरुषों के मनों में जो स्त्रियों के निकट अच्छे दीखने की इच्छा होती है, तथा उनका अधिक समय स्त्रियों के सहवास में बीतता है-इन्हीं दो कारणों के प्रताप से वीरकाल की नैतिक कल्पना का जो भाग अब तक बचा है, उसे क़ायम रखने में, उसकी परम्परा प्रचलित रखने में तथा पराक्रमशालित्व और औदार्य्य आदि उच्च गुण पोषण करने में स्त्रियों के मनोभाव आज भी अधिक भाग लेते हैं। इन बातों में स्त्रियों का नैतिक