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जाती है—और वह भी किसी और कारण से नहीं, बल्कि प्रचलित लोक-रीति ही से—तो वह स्त्रियों का अपनी पराधीनता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना ही है। जो स्त्री ऐसी बातों में शामिल होने की हिम्मत करती है—जिन्हें उसका पति पसन्द नहीं करता—तो उसे इसके लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है; और ऐसा होने पर भी इष्ट हेतु सफल नहीं होता; क्योंकि क़ायदे के अनुसार पति अपनी स्त्री पर अङ्कुश रख सकता है। जब तक सच्चे मन से स्त्रियों की सहायता करने के लिए बहुत से पुरुष तैयार न होंगे, तब
तक केवल स्त्रियों का अपनी पराधीनता के ख़िलाफ़ कमर कस कर खड़ा होना महा कठिन काम है।