पृष्ठ:स्त्रियों की पराधीनता.djvu/२४३

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लिए तो ये दरवाजे सदा के लिए बन्द रक्खे जाते हैं। बल्कि स्त्रियों के मन में कीर्त्ति का लोभ होना या अपना नाम चलाने की इच्छा होना-स्त्री-धर्म के लिए अनुचित समझा जाता है। फिर स्त्री के मन में रात-दिन और प्रतिपल यह ख़याल बना रहता है कि जिनके साथ उसका रात-दिन सम्बन्ध है उनके मन में अपने लिए अच्छा ख़याल बना रहे, उसका लक्ष्य सदा यही रहता है इस में आश्चर्य ही क्या है? क्योंकि समाज ने चारों तरफ़ से उन के मनो में यही ठूँस-ठूँस कर भर दिया है कि तुम्हारा इस संसार में केवल यही कर्त्तव्य है कि पुरुषों के फ़ायदे को अपने सामने रख कर ही हर एक काम करो। समाज का सङ्गठन ही इस प्रकार का है कि स्त्रियों के सुख की डोर कुटुम्ब के पुरुषों के पैरों में बँधी रहती है। चाहे पुरुष हो या स्त्री दोनों की यह इच्छा होती ही है कि लोगों में उनकी इज्ज़त बढ़े, चार आदमी उन्हें भला कहें। पर समाज ने ऐसा क़ानून बना डाला है कि स्त्री की इज्ज़त तभी बढ़े जब उसके मालिक या घर वालों की आबरू में वृद्धि हो-अर्थात् जब तक उस कुटुम्ब का पुरुष वर्ग अंधेरे में होता है तब तक उस कुटुम्ब की स्त्री चाहे जितनी बुद्धिमती हो किन्तु उसे कोई पहचानता ही नहीं। स्त्रियों को स्वतन्त्र रीति से कोई देखता ही नहीं, बल्कि संसार में जो थोड़ी-बहुत उनकी इज्ज़त होती है वह फलाने की बहू, फलाने की बहन या फलाने की बेटी के नाम से होती है।