पृष्ठ:स्त्रियों की पराधीनता.djvu/१४१

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ही प्रधान रक्खे और अपना मत भी वैसा ही जनावे, यदि कुछ नहीं तो पति के सामने ऐसा ढोंग बनाते मानों पति की इच्छा से भिन्न उसकी कोई स्वतंत्र इच्छा है ही नहीं; और पति को मनोवृत्तियों पर अपना अधिकार रखने में तथा अपने मनचाहे ढंग से उन्हें झुकाने में ही अपने जीवन की कृतकृत्यता माने, इस प्रकार का आचरण रखने से एक प्रकार उस स्त्री को सन्तोष का कारण मिलेगा, और वह इस प्रकार का होगा कि, जिन सांसारिक व्यवहारों की योग्यता या अनुभव उसने बिल्कुल नहीं प्राप्त किया और जिन विषयों में वह कोई सम्मति देने योग्य नहीं है, इसलिए उन-उन कामों में वह निष्पक्ष लाभ की सम्मति न देकर पक्षपात, दुराग्रह आदि बाह्य कारणों से खोटी सम्मति ही दे सकती है, उन में भी अपनी सम्मति को ही प्रधान रखवा कर वह पति को उस ग़लत रास्ते पर चला देगी-यही उसकी सत्ता होगी-यही उसके लिए अन्तोष का कारण होगा। किन्तु इसका परिणाम हानिकारक होता है; जो सीधे स्वभाव वाला पुरुष अपनी स्त्री से अत्यधिक ममता रखता है, स्त्री उसे बहुत कुछ अपनी मन्शा के अनुसार चलाती है, और कुटुम्ब से बाहर वाले व्यवहारों में स्त्री की सलाह के अनुसार चलते हुए उसे बहुत कुछ हानि उठानी पड़ती है। क्योंकि इस समय की प्रथा के अनुसार स्त्रियों को बचपन से ही यह शिक्षा दी जाती है कि