पृष्ठ:स्त्रियों की पराधीनता.djvu/१२९

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रखते हैं यह बात यद्यपि सत्य है, पर इसके साथ ही यह भी लक्ष्य में रखने योग्य है कि संसार में जिस प्रकार सुजनता और दुर्ज्जनता घट-बढ़ कर होती है वैसे ही कुटुम्ब-प्रेम भी मनुष्यों में घट-बढ़ कर होता है-और यहाँ तक कि बहुत से मनुष्यों का हृदय तो वज्र के समान कठोर और शुष्क होता है, उन्हें कुटुम्ब-स्नेह की गन्ध भी नहीं छू जाती। ऐसे मनुष्य किसी प्रकार के सामाजिक बन्धन से जकड़े नहीं होते, इस लिए उन्हें दाव में रखने के लिए समाज को क़ानून के द्वारा सज़ा का उपयोग करना पड़ता है। ऐसे निन्द्य, कठोर स्वभाव वाले मनुष्यों के हाथ में भी क़ायदे के अनुसार पतिपन के सब अधिकार होते हैं। अत्यन्त नीच और दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्य के हाथ में भी कमनसीब स्त्री की तक़दीर सौंपी जाती है, और उसे क़ानून के अनुसार जान से मारने को छोड़ कर बाक़ी और सब कुछ अधिकार होता है, और यदि वह तरीक़ों और युक्तियों से काम ले तो उस बिचारी की ऐसी हालत भी कर सकता है कि वह अपने आप ही मर जाय; पर क़ानून का हाथ उसकी रक्षा नहीं कर सकता-उसे बचा नहीं सकता। प्रत्येक देश में हज़ारों ऐसे निम्न श्रेणी के मनुष्य होते हैं जो अपने आपको निर्बल या अयोग्य समझ कर दूसरों के सामने पड़ने का भी साहस नहीं करते-उन्हें हिम्मत भी नहीं होती कि वे दूसरों के सामने बोल भी सकें, इसलिए क़ानून की दृष्टि से वे दोषी नहीं ठहराये जा सकते, पर वे ही मनुष्य