पृष्ठ:स्त्रियों की पराधीनता.djvu/१०६

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इसका उत्तम निर्णय हो ही नहीं सकता। इस ही प्रकार जो मनुष्य इस बात का निर्णय करने में प्रवृत्त हो कि, अमुक मार्ग का अनुसरण करने पर उसे सुख होगा, या उसका अनुसरण न करने पर सुख होगा, यदि इसका कोई निश्चय करना चाहेगा तो निश्चय पर पहुँचने के लिए कोई साधन उसके हाथ ही न लगेगा।

२४-यह बात हमें अच्छी तरह समझ रखनी चाहिये कि यदि हम स्त्रियों को पूर्ण स्वाधीनता दे देंगे तो केवल इतने ही कारण पर स्त्रियाँ उस काम को करने में प्रवृत्त कभी न होंगी जो उनके स्वभाव के प्रतिकूल है, स्वाधीनता मिलने पर अपनी वास्तविक इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकतीं। मनुष्यों को प्रकृति के बीच में रुकावट डालने की आदत छोड़ देनी चाहिए। मनुष्यों को ऐसे व्यर्थ के हाथ पैर पीटने छोड़ देने चाहिए कि वे सृष्टि के हेतु को निष्फल कर सकेंगे, या प्रकृति अपने मनोरथ को पूरा न कर सकेगी-वह तो हो ही नहीं सकता। जिस काम को स्वाभाविक रीति से स्त्रियाँ करने के योग्य ही नहीं है, जिस काम में वे सर्वथा असमर्थ है-उस काम के लिए उन्हें मना करना, सर्वथा निरर्थक और अनुपयोगी है। इस ही प्रकार जो काम ऐसे होंगे जिन्हें स्त्रियाँ पुरुषों से अच्छा नहीं कर सकेंगी, उन कामों में भी क़ानूनन रोकने की अपेक्षा पुरुषों की स्पर्द्धा ही काफी होगी क्योंकि कोई यह माँगता ही नहीं कि तुम स्त्रियों पर विशेष