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चौदहवाँ प्रस्ताव

नदू , जो चालाकी मे पूरा उस्ताद था और अपने को इसमें एकता समझता था, ऐसे ढंग से रहा और ऐसी सेवा-टहल की कि धनदास का यह बड़ा विश्वसित हो गया। यहाँ तक कि इसने अपनी ताली-कुंजी सब इसके सिपुर्द कर रक्खा। अपने पुराने नौकरों की भी बात न मान जो यह कहता वैसा ही धन- दास करने लगा। एक तो बूढ़ा था, दूसरे बीमारी के कारण चिरचिरा हो गया था। नंदू को यह एक बड़ी हिकमत हाथ लगी कि जब इसे किसी पर झुंझलाते और चिरचिराते देखता, तो इश्तियालक देने की भॉति दो-एक कोई ऐसी बातें , कह देता कि इसकी चिरचिराहट और चौगुनी बढ़ जाती थी । जिस पर यह झुँझला उठता था, उसकी मानो शामत आई । और, इस झुंझलाहट में वह चिल्लाता था, रोने लगता था, यहाँ तक कि मूड़ भी पीट डालता था। ऐसे मौके पर नंदू को अपनी खैरख्वाही जाहिर करने का मौका मिलता था। निदान यह बुड्ढा विलकुल सठिया गया । होशहवास भी दुरुस्त न रहते थे। मृत्यु के दिन समीप होने के जितने लक्षण होने चाहिए, सब इसमें आ गए । इस प्रकार के कृपण, कदर्य जीवन से जीनेवालों का यही तो परिणाम होता है, जो मानो आदमी के भले-बुरे होने की बड़ी भारी परख है। सुकृती मनुष्य की मरण-अवस्था ऐसी सुख की होती है कि किसी को मालूम नहीं होता कि कब उसके चोला से जान निकल गई; आनन-फानन पलक भॅजते-भॅजते शरीर से उसके