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नवाँ प्रस्ताव


"बाबू, मैंने यावत् बुद्धिबलोदय तुम्हें चिताने में कोई बात उठा नहीं रक्खी । मानना-न मानना तुम्हारे अधीन है-

"स्याने को जरा इशारा; मूरख को कोडा सारा।"

यह कह चंदू उठ खड़ा हुआ । बाबू ने बड़ी नम्रता-पूर्वक प्रणाम किया । चंदू आशीस दे घर की ओर चंपत हुआ। कुछ दिन तक इसकी नसीहत का बाबू पर बड़ा असर रहा, और ठीक-ठीक क्रम पर चला किया।अत को हज़ार मन साबुन से धोते रहो, वही कोयले का कोयला।

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नवाँ प्रस्ताव

चार दिना की चाँदनी, फिर अंधियारा पाख ।

चदू के उपदेश का असर बड़े बाबू पर कुछ ऐसा हुआ कि उस दिन से यह सब सोहबत-संगत से मुंह मोड़ अपने काम में लग गया। सवेरे से दोपहर तक कोठी का सब काम देखता-भालता था, और दोपहर के बाद दो बजे से इलाकों का सब बंदोबस्त करता था। वसूल और तहसील की एक- एक मद खुद आप जाँचता था । उजड़े असामियों को दिलासा दे ओर उनकी यथोचित सहायता कर फिर से बसाता था, और जो कारिंदों की गफलत से सरहंग हो गए थे, उन्हे दबाने और फिर से अपने कब्जे में लाने की फिक्र करता था। सुबह-शाम जब इन सब कामो से फुरसत पाता था, तो गृहस्थी के सब इंतजाम करता था। भाई-बिरादरी, नाता-