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आठवाँ प्रस्ताव


अपने मतलब के यार हैं, तुम्हें सब तरह पर बिगाड़ अपने-अपने घर बैठेंगे। सपूती के ढंग से बड़े सेठजी के दिखाए पथ पर जो अब तक तुम चले गए होते, तो तुम्हारे सुयश की सुगंध संसार में चौगुनी फैलती। सभ्य-समाज और बड़े लोगों में प्रतिष्ठा और इज्जत पाते; धन-संपत्ति भी चंद्रमा की कला-समान दिन-दिन बढ़ती जाती। बाबू, मै जी से तुम्हारा उपकार और भला चाहता हूँ; किंतु जब मैंने अपनी ओर तुम्हारी अश्रद्धा और अरुचि देखी, तो अलग हो गया। अस्तु। अब भी तुम चेतो, और अपने को सँभालो, अभी कुछ बहुत नहीं बिगड़ा। सेठजी के पुण्य-प्रताप से तुम्हें कमी किस बात की है? बाबू तुम ऐसे निरे मूर्ख भी नहीं हो, जो अपना भला-बुरा न समझ सकते हो। किंतु तुम भी क्या करो, यह नई जवानी का मदरूप अंधकार ऐसा ही होता है, जो नसीहत और उपदेश की सहस्रदीपावली की जगमगाहट से भी दूर नहीं हो सकता। इस उमर में जो एक प्रकार की खुदी सवार हो जाती है, जिसे दर्पदाहज्वर की गरमी कहना चाहिए, वह सैकड़ों शीतोपचार से भी नहीं घट सकती। विष-समान विषयास्वाद से उत्पन्न मोह ऐसा नहीं होता कि झाड़-फूँक और टोना-टनमन का कुछ असर उस पर पहुँचे।

"इस चढ़ती जवानी में यदि कहीं ईश्वर का दिया भोग-विलास का सब सामान और मनमानी धन-संपत्ति मिली, तो