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'सौ अजान और एक सुजान


बना हुआ था,वही अब मॉड़-भगतिए,कत्थक-कलावतों वे ङ्केभर जाने से मन और दिल्ली की अनुहार मारने लगा।हमारे बाबू साहब को इस बात का हौसला नित-नित बढ़त ही गया कि जो अमीरी के ठाटवाट हसारे यहाँ हों,वे अवर के बड़े-बड़े नौवाबजादे और ताल्लुक़दारों के यहाँ भी देखा मे न आवें। बड़े बाबू का हौसला देख छोटे बाबू साहब क्य पीछे हट सकते थे? इस तरह दोनो मिल खेत सींचनेवा दोगले की भॉति सेठ की चिरकाल की कमाई का संचित धा दोनो हाथों से उलच-उलच फेकने लगे। इस तरह वहाँ अजान लोगों का दल इकट्ठा होते देख और इन दोनों के कुढंग औ कुचाल की बढ़ती देख चदू-सा सुजान अचानक अंतर्दा हो गया। पर जी में इसके इस बात की चोट लगी रह गा कि हीराचंद-सरीखे सुकृती की संपत्ति का ऐसा बुरा परिणार होना अत्यंत अनुचित है।

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पाँचवाँ प्रस्ताव
इक भीजें चहलै परै वू.,बहैं हजार;
किते न औगुन जग करै बै-नै बढती बार।

शिशिर की दारुण शीत से जैसे सिकुड़े हुए देह धारियों के एक-एक अंग वसंत की सुखद ऊष्मा के संचार हो ही फैलने लगते हैं,उसी तरह कुसुमबाण की गरमी शरी