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सौ अजान और एक सुजान
 

तेईसवाँ प्रस्ताव

राजा करे सो न्याव, पासा पड़े सो दाँव।

नंदू का बुरा परिणाम देख इन बाबुओं को कुछ ऐसा भय-सा समा गया कि उसी दिन से इन्हें चेत हो आई । जैसा किसी को दीवानापन सवार हो गया हो, और लगातार किसी अकसीर दवा के सेवन से जब दीवानापन उतर जाय, अथवा सोने से जैसा कोई जाग पड़ा हो, या कोई मादक द्रव्य—भाँग, अफीम, शराब इत्यादि-पीकर मतवाला हो बकता फिरे, मद उतर जाने पर अथवा भूत सवार हो झार- फूँ क के उपरांत उतर जाने से होश आने पर अपने किए को पछताता हुआ मुॅह छिपाता फिरे, वही हाल इस समय दोनों बाबुओं का था। अब जो इन्हें चेत आई, तो एकांत में बैठे ये घंटों तक ऑसू बहाया करते और पछताते। सबसे अधिक पछतावा इन्हें बड़े सेठ साहब की बनी हुई बात के बिगड़ जाने और असंख्य धन के निकल जाने का था । "हाय ! इस बदमाश नंदू ने मुझे अपने जाल में फॅसाय मेरी कौन-कौन-सी दुर्गति करा डाली।" अब इनको यह खयाल आया कि जिस बात में अब भी किसी तरह ज़रा भी उस बदमाश का लगाव रह जायगा, उसमें कुशल नहीं । “यत्रास्ते विषसंसर्गोऽमतं तदपि मृत्यवे ।" अपने चचा बुड्ढे मानिकचंद का नंदू को बाबू ने मुखतार आम कर दिया था। उस मुखतारनामे को अदालत से मंसूख करा दिया, और नंदू की . सलाह मान मानिकचंद