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सौ अजान और एक सुजान

कोतवाल–हरामजादा अभी तक पड़ा-पड़ा सोता ही था; तू अपनी इस आदत से बाज न आएगा। बीसों मरतबा कह चुके। तुझे होश नहीं आता, समझेरह, खाल खिचवा लूॅगा।

फहमुआ–हुजूर माफ करे, कसूर भा, अब आगे से ऐसा न करिहौ। (हुक्का भर सामने लाय रख देता है )

(कोतवाल हुक्के की निगाली होठों के नीचे दाब पीनक में आय फिर मन में) इसमें कुछ शक नही, कोतवाली का ओहदा भी एक छोटी-सी बादशाहत है, मगर हुक्काम जिला अपने चंगुल में हों, तब। पहले जो साहब थे, उन्हें तो मैने खूब सॉट रक्खा था। शहर के इंतजाम का कुल दारमदार, साहब ने मुझ पर छोड़ रक्खा था; जो चाहता था, सो करता था। क्या कहें, साहब हमारे बड़े खूबी के आदमी थे। लोगों ने बहुतेरा मेरे खिलाफ कान भरा, पर उन्होंने एक न सुना। जो याफ्त मुझे उनके जमाने में हो गई, वह अब काहे को होना है । नया कलट्टर बड़ा सख्त-मिज़ाज मालूम होता है, आदमी यह बेलौस जरूर है, मुझे उम्मीद नहीं होती कि यह किसी तरह मेरे चंगुल में आ सकेगा। बेलौस और बड़ा मुंसिफ-मिजाज है ; रैयत की भलाई का भी उसे बहुत ख्याल है । खैर, देखा जायगा। कल से एक नया शिकार हाथ आया है, तीन वारेटगिरफ्तारी अदालत से, मेरे पास आए हैं; इस वारेट में सेठ हीराचंद के घराने के लोग शामिल हैं। मुकद्दमा यह ऐसा हाथ आया है कि खूब ही पाकेट