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समर्पण

 

सोमनाथ पट्टन को शताब्दियों की श्रद्धा और भक्ति ने एक देवभूमि बना दिया था। लक्षावधि लोग वहाँ कुछ काल वास करके ऐसा समझते थे कि भव के समस्त पाप-तापों से हम मुक्त हो गए। महालय का अन्तर्कोट कोई बीस हाथ ऊँचा और छह हाथ चौड़ा था। चार सैनिक आसानी से उस पर बराबर खड़े हो सकते थे।अन्तकोर्ट के सिंहद्वार के ठीक सामने गणपति का भव्य मन्दिर था। उसीपर नक्कारखाना था, जिसमें पहर-पहर पर चौघड़ियाँ बजती थीं। इस द्वार के दोनों पार्यों में दो विशाल दीपस्तम्भ थे, जिन पर संगतराशी का अत्यन्त शोभनीय काम हो रहा था। प्रत्येक स्तम्भ पर प्रतिदिन सहस्र दीप जलते थे, जिनका प्रकाश दूर से समुद्र-पथगामी जहाज़ों को सोमनाथ महालय के ज्योतिर्लिङ्ग की दिशा का भान कराता था। इन विशाल और ऊँचे दीपस्तम्भों के शिखर पर दो विशालकाय गण स्थापित थे, जो श्वेत मर्मर के थे। दक्षिण दीपस्तम्भ के सम्मुख चन्द्रकुण्ड था, जिसके विषय में प्रसिद्ध था कि उसमें स्नान करने से सर्वरोग-मुक्ति होती है तथा मनोकामना सिद्ध होती है।

इन्हीं दीपस्तम्भों के बीचोंबीच सभामण्डप में आने की विस्तृत सीढ़ियाँ थीं। सभामण्डप में होकर गर्भगृह का द्वार था। इसी गर्भगृह में वह त्रिभुवन-विख्यात ज्वलन्त ज्योतिर्लिङ्ग था। गर्भगृह के ऊपर एक विशालकाय शिखर था, जिसके प्रत्येक स्तम्भ पर देश-देश के शिल्प-विशारदों ने विविध भावभिङ्गयों से परिपूर्ण चित्र खोदे हुए थे। ये चित्र इतने उत्कृष्ट थे कि इनकी मूक-मौन भाव-भङ्गी देखकर सचराचर जीव मूक-मौन होकर मुग्ध रह जाते थे। यह शिखर स्वर्ण-निर्मित था। ऊपर-स्वर्ण-जटित था, भीतर रत्न-जड़ित। सूर्य की सतेज किरणों की चमक में वह द्वितीय सूर्य की भाँति चमकता था। और भीतर के रत्न,गर्भगृह के सहस्र दीपों के प्रकाश में मुखरित हो अद्भुत शोभा-विस्तार करते थे। सभामण्डप में प्रवेश करते ही दोनों तरफ दो विशालकाय ऐरावत कसौटी के बने थे, जिनपर भगवान् इन्द्र समूची स्फटिक मणि के खोद कर बनाए गए थे। देवराज इन्द्र की भावभंगी ऐसी थी-मानो वे सोमनाथ ज्योतिर्लिङ्ग की पूजा करने अभी अमरपुरी को त्याग कर महालय में आए हैं। सभामण्डप अड़तालीस खम्भों पर था, और वह इतना विशाल था कि उसमें पाँच सहस्त्र आदमी खड़े होकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर सकते थे। खम्भों पर रंग-बिरंगे रत्नों की पच्चीकारी की गई थी, जिनके कीमती पत्थरों की खुदाई देखते ही बनती थी।

मण्डप के सामने पूर्व दिशा में मुँह किए विशालकाय नन्दी था, जो ठोस चाँदी का बना था। वह एक सहस्र-भार वज़नी था। सहस्रावधि श्रद्धालु यात्री, मात्र उसकी पूँछ का स्पर्श करके ही अपने को भव बाधा पार समझते थे। ज्योतिर्लिङ्ग पर दिन-रात अखण्ड रुद्री होती थी और सम्मुख सभामण्डप में सूर्योदय से मध्य रात्रि तक निरन्तर नृत्य होता था।

अभी सूर्योदय नहीं हुआ था, गंग सर्वज्ञ बाघ-चर्म पर बैठे अर्चन-विधि सम्पन्न करा