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अलबरूनी . 60 शेख अलबरूनी बहुत भारी विद्वान् थे। इनकी अवस्था सत्तर से भी ऊपर थी। रंग एकदम काला, बहुत ऊँची उठान, लम्बी सफेद दाढ़ी, गृध्र के समान तेज और भेदिनी दृष्टि। सम्पुटित ओष्ठ, अल्प भाषी। शेख नदी-तीर की अपनी एकान्त झोंपड़ी में बैठे कुछ ज्योतिष की रेखाएँ खींच रहे थे। उनके सम्मुख दिग्विजयी अमीर छद्म-वेश में बैठा चुपचाप उनके मस्तिष्क पर बनने- बिगड़ने वाली रेखाओं को ध्यान और अधैर्य से देख रहा था। दोनों मौन थे। वृद्ध शेख कुछ उलझन में थे, ऐसा प्रतीत होता था कि वे कुछ निर्णय नहीं कर पा रहे हैं। अन्त में अधीर होकर अमीर ने कहा- "जैसा कुछ आपने समझा है, कहिए।" "अभी कुछ नहीं कह सकता सुलतान!" “अब नहीं तो फिर कब? जो कुछ कहना है, अभी कहिए।" "तो बेहतर हो कि आप चुपचाप अभी सिन्ध की राह वापस गज़नी चले जाएँ।” “खूब, यह आप महमूद को सलाह दे रहे हैं हज़रत?" “हुजूर, मैं लाचार हूँ, आपके सितारे मुझे उलझन में डाल रहे हैं।" “काफिरों का यह इल्म नजूम भी क्रुफ है। आप इस पर क्यों यकीन करते हैं?" बूढ़े शेख ने भौंहों में बल डालकर एक बार अमीर की ओर देखा, फिर शान्त स्वर कहा, "सुलतान, इल्म की कोई जात-बिरादरी नहीं। वह सदा सच्चा है, सूरज की तरह चमकदार हीरा, गलाज़त से उठाया हुआ भी हीरा ही है। बस, आपको अगर इल्म-नजूम कुफ्र दीख पड़ता है तो शेख को माथा-पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। बिस्मिल्लाह कीजिए।" उसने तख्ती उठाकर रख दी और मौन हो बैठा। अमीर ने नरम होकर कहा, “खैर, आपने जो समझा हो, वहीं कहिए।" “आपका एक सितारा बहुत खराब है, लेकिन उसका असर आज की तारीख से ठीक चौथे माह होगा।" “उसका क्या असर है?" "आपकी जिन्दगी, फतह और इज्जत पर खतरा।" "कैसा खतरा?" अमीर के होंठ गुस्से से चिपक गए। "लड़ाई में शिकस्त भी हो सकती है, आपके दुश्मनों की जान को भी जोखिम है।" "तो क्या परवाह, महमूद ने तो ऐसे बहुत-से खतरे उठाए हैं हज़रत!" “सुलतान, हर उरूज का एक ज़वाल है; सूरज उगता है, उठता है, तपता है, फिर आखिर ग़रूब होता है।" “तो इससे क्या? दूसरे दिन सुबह फिर उगता है।" “हजूर, इल्म में बहस बेकार है।"