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“नहीं महाराज, इस कार्य के लिए योग्य पुरुष को मैंने पाटन में ही रोक रखा है।" “वह कौन?" “चण्ड शर्मा।" "वह तो दामोदर के गुट का आदमी है।" “कभी था। अब तो वह आपका अनुगत है, मेरी सम्मति है कि आप स्वयं चाहे पाटन में अभी न जाएँ, अपनी आन फेर दें! मैं नहीं चाहता कि लोग यह कहें कि आप ही डर कर अमीर को पाटन में ले आए हैं। इसकी बदनामी को तो हम अपने सिर ले लेंगे। ब्राह्मण हूँ, सो पाप नहीं लगेगा।” भस्मांक हँस दिए। दुर्लभदेव भी हँसे। “अच्छी बात है, तो आप अमीर से मिलिए। मैं पत्र और मुद्रा देता हूँ।" भस्मांकदेव दुर्लभ का विश्वास-पत्र और मुद्रा लेकर आबू की उपत्यका में अमीर की छावनी में जा पहुँचे। अमीर ने खूब ठसक से इस ब्राह्मण का स्वागत किया। उसके लिए गुजरात की भूमि में बराबर सुयोग मिलते जा रहे थे। अमीर ने कहा, “हमारे दोस्त गुजरात के महाराज दुर्लभदेव अमीर से क्या चाहते हैं?" "नामदार अमीर हमारे महाराज के ऐसे ही दोस्त हमेशा बने रहें, यही उनकी इच्छा है।" "यकीनन, हम गुजरात के महाराज के दोस्त हैं।" "तो महाराज चाहते हैं कि सिद्धपुर और पाटन को कोई नुकसान न पहुँचाया जाए। महाराज की आज्ञा से हम पाटन में अमीर का शाही स्वागत करेंगे। अब अमीर नामदार भी पाटन की रियाया को अपनी रियाआ समझ कर उसकी जान-माल की सलामती का वचन दें।" “अल्हम्दुलिल्लाह, ऐसा ही होगा।" "हमारे महाराज, यह भी चाहते हैं कि महाराज के साथ अमीर नामदार के जो कौल-करार हुए हैं, वे अभी पोशीदा ही रहें। जिससे रियाया बदगुमान न हो। फिर प्रभास की वापसी में अमीर खुले दरबार में हमारे महाराज को गुजरात का राजा स्वीकार कर लें।" "हमको मंजूर है।" "तो जहांपनाह, कम्बल जैसे-जैसे भीगता है, भारी होता है।" "यह क्या महाराज की बात है?" "नहीं, इस ब्राह्मण की।" अमीर ने हँसकर कहा, “आप हमारे बुजुर्ग हैं, आपकी बात की हम कद्र करते हैं और समझ गए हैं।" इसके बाद अमीर ने खूब भारी भेंट देकर भस्मांकदेव को विदा किया। सब तरह कृतकृत्य होकर भस्मांकदेव पाटन लौटे।