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अभी उधर से हम निश्चिन्त रह सकते हैं।" दामोदर महता ने विवेचना की। महाराज वल्लभदेव ने कहा-“लेकिन आबू चन्द्रावती पर तो हमें तुरन्त ही अधिकार कर लेना चाहिए।" “निस्संदेह, राजा और युवराज राजधानी में नहीं हैं। राजा मालवराज के पास है, और युवराज नान्दोल के राजकुमार के पास। अमीर से वे आश्वस्त हैं ही। इससे वे अभी मालवराज और अनहिल्लराय का सान्निध्य छोड़ इधर नहीं आएंगे। परमार ने हमें न राजस्व दिया है, न सहायता। इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि चन्द्रावती पर तुरन्त अधिकार कर लिया जाए और मन्त्रीश्वर वहाँ के दण्डनायक होकर जाएँ।" "परन्तु विमल के बिना हमारा दाहिना हाथ ही भंग हो जाएगा।” भीमदेव ने कहा। "नहीं महाराज, हमारी दाहिनी भुजा तो चन्द्रावती ही है, बिना मन्त्रीश्वर के वहाँ गए निस्तार नहीं है।” महता ने बल देकर कहा। "क्या अमीर से वहीं लोहा लेना होगा?” राव ने पूछा। “न, अमीर को छेड़ने का कोई काम नहीं है। मन्त्रीश्वर परमार की सन्धि की आन रख उसे चला आने दें। अमीर ऐसी अवस्था में है कि इस भीतरी परिवर्तन पर उसका ध्यान न जाएगा। दुर्लभराय ने अरावली की उपत्यका में अमीर को दुर्गम घाटियों में फंसा रखा है, अब तक की मिली सूचनाओं के आधार पर वह गहरी विपत्ति में दुर्गम वन में फँसा है।" महता ने जवाब दिया। इसपर महाराज वल्लभदेव ने कहा, “किन्तु वहाँ उसकी समाप्ति तो होगी नहीं। हमें ढीला नहीं पड़ना चाहिए।" “यह तो है ही। इसी से मैंने कहा। मन्त्रीश्वर आबू में बैठकर परमार और अमीर दोनों पर गृध्र दृष्टि रखें। क्या जाने, अमीर की वापसी पर चन्द्रावती में ही निर्णायक युद्ध हो।” दामोदर ने गम्भीरता से कहा। “यह बहुत सम्भव है, यह तो ठीक ही कहा है।” भस्मांकदेव ने समर्थन किया। दामोदर के प्रस्ताव का सबने समर्भन किया। विमलशाह का आबू जाना निश्चित हो गया। “अब सिन्धुपति हुम्मकदेव?” महाराज वल्लभदेव ने कहा। "तुमने कहा था महता, वह तो सीधी तलवार से बात करना है, है न?" भीमदेव ने कहा। "हाँ, महाराज।" "तो उसपर मेरी यह तलवार है," कीर्तिनगर के केसर मकवाणा ने जोश में आकर कहा, “गज़नी के दैत्य के आने से पहले ही मैं हुम्मकदेव की तलवार दो टूक करके सोमनाथ पट्टन में आपकी सेवा में आ उपस्थित होऊँगा।" जूनागढ़ के राव ने हुंकृति की, “अब ठीक हुआ।” दामोदर ने संतोष की साँस ली -"अब पाटन।" “पाटन और उसकी राजनीति को मेरे ऊपर छोड़िए। मैं वचन देता हूँ, पाटन की एक ईंट की भी क्षति नहीं होगी, एक दम्म भी खर्च नहीं होगा, एक मनुष्य की भी प्राण- 6