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आशा कुछ भी फलवती न हुई। अनहिल्लराय का कुछ भी नुकसान नहीं हुआ, जो हुआ उसकी पूर्ति उसने आनन-फानन कर डाली। दूसरा काम उसने यह किया कि अत्यन्त गुप्त रूप से उसने अमीर के पास अपना दूत भेजकर इस शर्त पर उसका मार्ग-विरोध न करने तथा सब सम्भव सहायता देने की स्वीकृति भेज दी कि वह सोमनाथ अभियान के सफल होने पर वापसी में उसे ही गुजरात का अधीश्वर स्वीकार कर ले। दुर्लभदेव का यह संदेश वास्तव में अमीर के लिए एक वरदान था। यदि इस समय दुर्लभदेव अपनी सेना लेकर अमीर पर पिल पड़ता तो इसमें तनिक भी संदेह न था कि अमीर का एक-एक घोड़ा और एक-एक सवार इसके तीरों से बिंध जाता। और अमीर को गुजरात की दहलीज़ में ही अपनी समाधि लगानी पड़ती। दुर्लभदेव ने इतना ही नहीं किया, उसने ऐसी भी व्यवस्था कर दी कि आबू और झालौर के परमार भी अमीर का अवरोध न करें। उन्हें इस खटपटी राजपुत्र ने विश्वास दिला दिया कि वे अपने धन-जन को खतरे में न डालें-गज़नी के दैत्य को सीधा गुजरात की सीमा में धंसा चला आने दें। यहाँ आने पर वह उसे पीस डालेगा। पीछे आवश्यक हुआ तो वह उनसे अमीर के पृष्ठ भाग पर आक्रमण करने का अनुरोध करेगा। यह योजना यदि अमल में सचमुच आती, तो अमीर का यहाँ से निस्तार नहीं था। पर भारत के भाग्य ऐसे कहाँ थे; भारत को तो अपनी लाज खोनी थी। दुर्लभदेव ही के समान आबू के परमार अपनी स्वार्थमयी महत्त्वाकांक्षा की खिचड़ी पका रहे थे। वह न केवल अवन्तीपति भोज का पराभव करने पर तुले थे अपितु गुर्जरेश्वर की अधीनता का इस सुअवसर पर जुआ उतार फेंकने को भी उतावले हो रहे थे। यदि इस सुयोग में अमीर दुर्लभदेव और गुर्जरेश्वर का दलन कर डाले और उनका सैन्य बल तथा कोष अक्षुण्ण बना रहे तो इससे उत्तम बात और हो क्या सकती थी। उन्होंने दुर्लभदेव की योजना का हर्ष से स्वागत किया तथा कपट-भाव से आश्वासन दिया कि आवश्यकता पड़ने पर पीछे से आक्रमण करके उसे सहायता पहुँचाएँगे। परन्तु उन्होंने यह ठान ली थी कि यह कोरा आश्वासन ही रहेगा। गुप्त रूप से उन्होंने भी अमीर को दूत भेज कर कहला भेजा था कि यदि अमीर उनके राज्य की सीमा में कोई उपद्रव न करे तो वे उसे निर्बाध रूप से आबू की राह गुजरात में प्रविष्ट होने से रोकेंगे नहीं। हाय रे भारत के भाग्य, हाय रे राजपूतों की कलंकित स्वार्थ-नीति! इसी ने तो राजपूतों को संगठित न होने दिया, इसी से तो वै महावीर होते हुए इस मार-काट के युग में बड़े-बड़े सुयोग पाकर भी कोई अपना साम्राज्य स्थापित न कर सके। वे अपने ही स्वार्थों में, अपनी ही योजना में मरते-कटते रहे। अमीर ने न केवल परमार के इस आश्वासन का स्वागत किया-अपितु उसने परमार को बहुत-सी भेंट-भलाई भेजकर बारम्बार अपनी मित्रता का वचन दिया। यहाँ गुजरात के द्वार पर आकर उसे नये अनुभव हो रहे थे। जहाँ उसे अन्यत्र मैत्री की भीख माँगनी पड़ी थी, यहाँ मैत्री की भीख उससे माँगी जा रही थी। जबकि वह अत्यंत जीर्ण-शीर्ण और विपन्नावस्था में था और उसे सोमनाथ-विजय तो एक ओर, सही-सलामत गज़नी लौट जाने की भी आशा न रही थी। झालौर का रावल वाक्पति राज परमार चौहानों का सम्बन्धी था। वह एक बूढ़ा, सनकी और घमण्डी आदमी था। उसे अपनी वीरता पर बड़ा अभिमान था। अपने को वह घोघाबापा से तनिक भी कम न समझता था। इनमें सन्देह नहीं कि वह एक साहसी योद्धा