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सेवासदन
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पद्म---हाँ, ऐसा होना असभव नहीं।

विठ्ठल तो क्या आप कोई प्रतिज्ञा पत्र लिखवाना चाहते हैं?

पद्म-नहीं, मुझ सदेह यही है कि वह सुख-विलास छोड़कर विधवाश्रम मे क्यों जाने लगी और सभा वाले उसे लेना स्वीकार कब करेंगे?

विट्ठल---सभा वालो को मनाना तो मेरा काम है। न मानेगे तो में उसके गुजारे का और कोई प्रबंध करूंगा। रही पहली बात। मान लीजिये, वह अपने वचन को मिथ्या ही कर दे तो इसमें हमारी क्या हानि है? हमारा कर्तव्य तो पूरा हो जायगा।

पद्म-हाँ, यह सन्तोष चाहे हो जाये, लेकिन देख लीजियेगा वह अवश्य धोखा देगी।

विठ्ठलदास अधीर हो गये; झुंझलाकर बोले, अगर धोखा ही दे दिया तो आपका कौन छप्पन टका खर्च हुआ जाता है।

पद्म-आपके निकट मेरी कुछ प्रतिप्ठा न हो, लेकिन मैं अपने को इतना तुच्छ नही समझता।

विट्ठल---सारांश यह कि न जायगे?

पद्म-मेरे जानसे कोई लाभ नही है। हाँ, यदि मेरा मानमर्दन कराना ही अभीष्ट हो तो दूसरी बात है।

विटठल---कितने खेद की बात है कि आप एक ज़ातीय कार्य के लिये इतनी मीनमेष निकाल रहे है। शोक। आप ऑखो से देख रहे हैं कि हिन्दू जाति की स्त्री कुंए में गिरी हुई है, और आप उसी जाति के एक विचारवान पुरुष होकर उसे निकालने में इतना आगा-पीछा कर रहे है! बस, आप इसी काम के है कि मूर्ख किसानो और जमींदारो का रक्त चूसे। आपसे और कुछ न होगा।

शर्माजी ने इस तिरस्कार का उत्तर न दिया। वह मन में अपनी अकर्मण्यता पर स्वयं लज्जित थे और अपने को इस तिरस्कार का भागी समझते थे। लेकिन एक ऐसे पुरुष के मुँह से ये बातें अत्यंत अप्रिय मालूम हुई, जो इस बुराई का मूल कारण हो। वह बड़ी कठिनाई से प्रत्युत्तर देने के आवेग को