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सेवासदन
३५
 


थी; तब तक रक्षक ने दौड़कर गुलदस्ते बनाये और उन महिलाओं को भेट किये। थोड़ी देर बाद वह दोनों आकर उसी बेंच पर बैठ गयी, जिस पर से सुमन उठा दी गई थी। रक्षक एक किनारे अदबसे खड़ा था। यह दशा देखकर सुमन की आँखों से क्रोध के मारे चिनगारियाँ निकलने लगी। उसके एक-एक रोमसे पसीना निकल आया। देह तृण के समान काँपने लगी। हृदय मे अग्निकी एक प्रचंड ज्वाला दहक उठी। वह अञ्चल मे मुँह छिपाकर रोने लगी। ज्योंही दोनो वेश्याएँ वहाँ से चली गयी, सुमन सिंहिनी की भांति लपककर रक्षक के सम्मुख आ खड़ी हुई और क्रोध से काँपती हुई बोली, क्यों जी, तुमने मुझे तो बेंचपर से उठा दिया जैसे तुम्हारे बाप ही की है, पर उन दोनों राड़ों से कुछ न बोले?

रक्षक ने अपमानसूचक भाव से कहा, वह और तुम बराबर! आगपर घी जो कुछ करता है वह इस वाक्यने सुमन के हृदय पर किया। ओठ चबाकर बोली, चुप रह मूर्ख! टके के लिए वेश्याओं की जूतियाँ उठाता है, उसपर लज्जा नहीं आती। ले देख तेरे सामने फिर इस बेंचपर बैठती हूँ, देखूँ तू मुझे कैसे उठाता है।

रक्षक पहले तो कुछ डरा, किन्तु सुमन के बेंचपर बैठते ही वह उसकी ओर लपका कि उसका हाथ पकड़ कर उठा दे। सुमन सिंहनी की भाँति आग्नेय नेत्रोंसे ताकती हुई उठ खड़ी हुई। उसकी एड़ियाँ उछली पड़ती थी। सिसकियों के आवेग को बलपूर्वक रोकने के कारण मुँह से शब्द न निकलते थे। उसकी सहेलियाँ जो इस समय चारों ओर से घूमघामकर चिड़ियाघर के पास आ गई थीं, दूर से खड़ी यह तमाशा देख रही थीं। किसी को बोलने की हिम्मत न पड़ती थी।

इतने में फिर एक गाड़ी सामने से आ पहुँची। रक्षक अभी सुमन से हाथापाई कर ही रहा था कि गाड़ी में से एक भलेमानस उतरकर चौकीदार के पास झपटे हुए आए और उसे जोर से धक्का देकर बोले, क्यों बे, इनका हाथ क्यों पकड़ता है? दूर हट।