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सेवासदन
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कि २०-२५ वेश्याओं ने अपनी लड़कियों को अनाथालय में भेजना स्वीकार कर लिया। तीन वेश्याओं ने अपनी सारी सम्पत्ति अनाथालय के निमित्त अर्पण कर दो, पाँच वेश्याएँ निकाह करने पर राजी हो गई। सच्ची हिताकांक्षा कभी निष्फल नहीं होती। अगर समाज को विश्वास हो जाय कि आप उसके सच्चे सेवक हैं, आप उनका उद्धार करना चाहने है, आप निःस्वार्थ है तो वह आपके पीछे चलने को तैयार हो जाता है। लेकिन यह विश्वास सच्चे सेवाभावके बिना कभी प्राप्त नहीं होता। जब तक अन्त करण दिव्य और उज्ज्वल न हो, वह प्रकाश का प्रतिबिम्ब दूसरी पर नहीं डाल सकता। पद्मसिंह में सेवाभाव का उदय हो गया था। हममें कितने ही ऐसे सज्जन है जिनके मस्तिष्क से राष्ट्र की कोई सेवा करने का विचार उत्पन्न होता है, लेकिन बहुधा वह विचार ख्याति लाभ की आकाक्षा से प्रेरित होता है। हम वह काम करना चाहते हैं जिसमे हमारा नाम प्राणिमात्र की जिव्हा पर हो, कोई ऐसा लेख अथवा ग्रन्थ लिखना चाहते है, जिसकी लोग मुक्त कण्ठ से प्रशसा करे, और प्रायः हमारे इस स्वार्थ प्रेम का कुछ न कुछ बदला भी हमको मिल जाता है, लेकिन जनता के हृदय में हम घर नहीं कर सकते। कोई मनुष्य चाहे वह कितने ही दुःख में हो, उस व्यक्ति के सामने अपना शोक प्रकट नहीं करना चाहता जिसे वह अपना सच्चा मित्र न समझता हो।

पद्मसिंह को अब दालमण्डी में जाने को बहुत अवसर मिलता था और वह वेश्याओं के जीवनका जितना ही अनुभव करते थे उतना ही उन्हें दु:ख होता था। ऐसी-ऐसी सुकोमल रमणियों को भोगविलास के लिए अपना सर्वस्व गँवाते देखकर उनका हृदय करुणा से विव्हल हो जाता था, उनकी आँखो से आँसू निकल पड़ते थे। उन्हें अवगत हो रहा था कि यह स्त्रियाँ विचारशून्य नहीं, भावशून्य नहीं, बुद्धिहीन नहीं, लेकिन मायाके हाथों- में पड़कर उनकी सारी सद्वृतियाँ उल्टे मार्गपर जा रही है, तृष्णाने उनकी आत्माओं को निर्बल, निश्चेष्ट बना दिया है। पद्मसिंह इस माया-जाल को तोड़ना चाहते थे, वह उन भूली हुई आत्माओं को सचेत किया