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सेवासदन
 


बिना भोजन किए काम पर जाना पड़ता। उसकी समझ मे न आता कि यह क्या मामला है, यह कायापलट क्यो हो गई है।

सुमन को अपना घर अच्छा न लगता। चित्त हर घडी उचटा रहता। दिन दिनभर पड़ोसिनो के घर बैठी रहती।

एक दिन गजाधर आठ बजे लौटे तो घर का दरवाजा बन्द पाया। अन्धेरा छाया हुआ था। सोचने लगे रात को वह कहाँ गई है? अब यहाँ तक नौबत पहुँच गई? किवाड खटखटाने लगे कि कही पड़ोस मे होगी तो सुनकर चली आवेगी। मन मे निश्चय कर लिया था कि आज उसकी खबर लूँगा। सुमन उस समय भोली बाई के कोठे पर बैठी हुई बातें कर रही थी। भोली ने आज उसे बहुत आग्रह करके बुलाया था। सुमन इनकार कैसे करती? उसने अपने दरवाजे का खटखटाना सुना तो घबराकर उठ खड़ी हुई और भागी हुई अपने घर आई। बातो मे उसे मालूम ही न हुआ कि कितनी रात चली गई। उसने जल्दी से किवाड खोले चटपट दीया जलाया और चूल्हे में आग जलाने लगी। उसका मन अपना अपराध स्वीकार कर रहा था। एकाएक गजाधर ने बुद्ध भाव से कहा तुम इतनी रात तक वहाँ बैठी क्या कर रही थी? क्या लाज शर्म बिलकुल घोलकर पी ली है?

सुमन ने दीन भाव से उत्तर दिया-उसने कई बार बुलाया तो चली गई। कपड़े उतारो अभी खाना तैयार हुआ जाता है। आज तुम ओर दिनो से जल्दी आये हो।

गजाधर—खाना पीछे बनाना, मैं ऐसा भूखा नही हूँ। पहले यह बताओ कि तुम वहाँ मुझसे पूछे बिना गई क्यो? क्या तुमने मुझे बिलकुल मिट्टी का लोदा ही समझ लिया है?

सुमन-—सारे दिन अकेले इस कुप्पी में बैठा भी तो नही रहा जाता।

गजाधर--तो इसलिए अब वेश्याओ से मेलजोल करोगी? तुम्हे अपनी इज्जत आवरू का भी कुछ विचार है?