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सूरसागर।


पैनीं॥ दरशन हूं नाशे यम सैनिक जिमि नह बालक सैनी। एक नाम लेत सब भाजै पीर सुभूमि रसैनी॥ जाजल युद्ध निरखि सन्मुख ह्वै सुन्दर सैना वैनी। सूर परस्पर करत कुलाहल गर सृक यह रावैनी॥९॥ राग विलावल ॥ गंग तरंग विलोकत नैन। अति पुनीत विष्णु पादोदक महिमा निगम पढ़त गुन चैन॥ परम पवित्र मुक्तिकी दाता भागीरथै भई वर दैन। द्वादश वर्ष सेये निशि वासर तब शंकर भाषी है लैन॥ त्रिभुवन हार सिंगार भगवती सलिल चराचर जाके ऐन। सूरजदास विधाताके तप प्रगट भई संतन सुख दैन॥१०॥ परशुराम अवतार वर्णन। राग बिलावल ॥ ज्यों भयो परशुराम अवतार। कहौं सुकथा सुनौ चितधार॥ सहसबाहु रवि बंशी भयो। सरिता तिर इक दिनसो गयो। निज भुजबल तिन सरिता गही। बढि गयो जल तब रावण कही। नृप तुम हमसों करो लराई। कह्यो करो मध्यान बिताई॥ बहुरो क्रोधवंत युध छयो। सहसबाहु तब ताको गह्यो। बहुरो नृप करिकै मध्यान। दीनो ताको छांड़ि निदान। फिर नृप जमदग्नाश्रम आयो। कामधेनु बल करि लै धायो॥ परशुराम जब यह सुधि पाई। मारयो ताहि तुरंतहि धाई॥ तासु सुतनि जमदग्निहि मारयो। परशुराम रेणुका हँकारयो॥ मारयो क्षत्री इकइस बार। यों भयो परशुराम अवतार॥ शुक नृप सों ज्यों कहि समुझायो। सूरदास त्योंही कहि गायो॥११॥ राग धनाश्री ॥ परशुराम जमदग्नि गेह लीनो अवतार। माता ताकी यमुन जल लेन गई इक बार॥ लागी तहां अबार तिहि ऋषि करि क्रोध अपार। परशराम सों यों कही माको वेगि संहार॥ और सुतन तब कही पिता नहि कीजै ऐसी। क्रोधवंत ऋषि कह्यो करौ इनसों हू वैसी॥ परशुराम तिन सबनको मारयो खड्ग प्रहार। ऋषि कह्यो होइ प्रसन्न वर मांगों देउँ कुमार॥ परशुराम तब कह्यो यहै पर देहु तात अव। जाने नाहिन मुए फेरिकै जीवैं ये सब॥ ऋषि को यह वर दियो मैं इनको देहु उठाइ। परशुराम उनको दियो सोवत मनो जगाइ॥ परशुराम वन गए तहां दिन बहुत लगाये। सहसवाहु तिहि समय जमदगिन आश्रम आए॥ कामधेनु जमदग्नि की लै गयो नृपति छिनाय। परशुराम सों बोलि ऋषि दियो वृत्तान्त सुनाय॥ परशुराम सुनि पिता वचन ताको संहारयो। कामधेनु दई आनि वचन ऋषिको प्रतिपारयो। सहसवाहु के सुतन पुनि राखी घात लगाइ। परशुराम जब बन गयो मारयो ऋषि को धाइ॥ ऋषि की यह गति देखि रेणुका रोइ पुकारी॥ परशुराम तुम आइ लगत क्यों नहीं गोहारी॥ यह सुनिकै आयो तुरत मारयो तिन्हें प्रचार। बहुरो जिय धरि क्रोध हति क्षत्रीबीसिकवार॥ जग अराज है गयो ऋषिन तब अति दुख पायो। लै पृथ्वी को दान ताहि फिर वनहिं पठायो। बहुरि राज्य दियो क्षत्रियनि भयो ऋषिन आनंद। सूरदास पावत हरष गावत गुण गोविंद॥१२॥ रामअवतार कारण। रागविलावल ॥ हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो॥ हरि चरणार्विंद उर धरो॥ जय अरु विजय पार्षद दोइ। विप्र शराप असुर भये सोय ॥ एक बराह रूप धरि मारयो। एक नृसिंह रूप संहारयो॥ रावण कुंभ कर्ण सोइ भये। राम जन्म के तिनके हित लए॥ दशरथ नृपति अयोध्या राव। ताके गृह कियो आविर्भाव॥ नृपसों ज्यों शुकदेव सुनायो। सूरदास त्योंही कहि गायो॥ १३ ॥ बालकांड श्रीराम जन्म वर्णन। राग कान्हरा ॥ आजु दशरथके आंगन भीर। आए भुव भार उतारन कारन प्रगटे श्याम शरीर॥ फूले फिरत अयोध्या वासी गनत न त्यागत चीर। परिरम्भन हँसि देत परस्पर आनंद नैननि नीर॥ त्रिदश नृपति ऋषि व्योम विमाननि देखत रहे न धीर॥ त्रिभुवन नाथ दयालु दरशदै हरी सबन की पीर॥ देत दान राख्यो न भूप कछु महा बड़ेनगहीर। भये निहाल सूर सब याचक जे याचे