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साहित्य-सीकर

ज्यादा महँगी पुस्तक है। तिस पर भी उक्त पुस्तकालय ने अकेले ही इस पुस्तक की ४५,००० रुपये की कीमत की जिल्दें खरीद ली हैं।

पर जैसे नई पुस्तकें अधिक से अधिक मँहगी होती है वैसे ही पुरानी पुस्तकों के सस्ते से सस्ते संस्करण सैकड़ों की तादाद में, निकलते चले आते हैं। अँगरेज लेखकों और प्रकाशकों ने अपने तजरुबे से यह नतीजा निकाला है कि सस्ती पुस्तकों से लोगों को पढ़ने का चसका जहाँ पर एक बार लग गया तहाँ वे नई पुस्तकें, मँहगी होने पर भी खरीदने को मजबूर होते हैं।

यह कहने की आवश्यकता नहीं कि सारे साहित्य व्यापार की जड़ लेखक ही है। उन्हीं की कदर या नाकदरी पर साहित्य की उन्नति या अवनति का दारोमदार है। यह कहा जा चुका है कि इँगलैड के लेखक खूब रुपया पैदा करते हैं—इसके कुछ उदाहरण भी सुन लीजिये। यहाँ "स्ट्रेड" और "ब्लेकउड" नामक दो प्रसिद्ध मासिक हैं। वे अपने लेखकों को ४५ से ७५ रुपये तक प्रति हजार शब्दो के देते हैं। मामूली मासिक पत्र भी कम से कम अपने लेखकों को बत्तीस रुपये प्रति हज़ार शब्दों के देते हैं। अधिक से अधिक की बात ही न पूछिए। उपन्यासकारों को प्रति शब्द के हिसाब से उजरत दी जाती है। जब १८९४ में स्टेविन्सन नामक उपन्यास लेखक मरा तब हिसाब लगाने से मालूम हुआ कि अपने जीवन भर में जितने शब्द उसने लिखे, छः आने प्रति शब्द के हिसाब से उसको उजरत मिली। पर आजकल यह दर कुछ बहुत नहीं समझी जाती। 'पियर्सन्स मैगजीन' के प्रकाशक ने एक किस्से के लिए उसके लेखक केपलिंग साहब को बारह आने प्रति शब्द दिये थे। सर आर्थर केनन डायल जासूसी किस्से लिखने में बड़े सिद्धहस्त हैं। उन्होंने उक्त मासिक पत्र में जो आख्यायिकायें लिखी हैं उनमें से प्रत्येक आख्यायिका का पुरस्कार