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पुराने अँगरेज अधिकारियों के संस्कृत पढ़ने का फल

यदि बढ़ी हुई नहीं है तो कम भी किसी तरह नहीं। वे यह भी जान गये कि जिस ग्रीक-भाषा के साहित्य की श्रेष्ठता के वे लोग इतने कायल हैं, संस्कृत का साहित्य उससे भी किसी-किसी अंश में, आगे बढ़ा हुआ है। प्राचीनता में तो संस्कृत-साहित्य की बराबरी किसी भी भाषा का साहित्य नहीं कर सकता।

शकुन्तला रचना-कौशल को देखकर योरपवालों को जितना कौतूहल हुआ उसके कथानक का विचार करके उससे भी अधिक आश्चर्य हुआ। उसके कथानक का सादृश्य उन्हें एक ग्रीक कहानी में मिल गया। और जब उन लोगों ने विक्रमोर्वशी देखी तब उनके कथानक की भी सदृशता उन्हें ग्रीक-भाषा की एक कहानी में मिली। इस पर उन लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही। वे सोचने लगे कि क्या बात है जो इन असभ्य अथवा अर्द्धसभ्य भारतवासियों की बातें उन पूज्यतम ग्रीक लोगों की बातों से मिलती हैं। कहीं दोनों के पुरुषों का किसी समय एकत्र वास तो नहीं रहा? यह तो साधारण आदमियों की बात हुई। भाषा-शास्त्र के जानने वालों को पुरातत्व वेत्ताओं को तथा पुरानी कथा-कहानियों का ज्ञान रखनेवालों को तो विश्वास-सा हो गया कि इस साम्य का जरूर कोई बहुत बड़ा कारण है। शकुन्तला के पाठ और बंगाले की एशियाटिक सोसायटी की स्थापना से सर विलियम जोन्स के सिवा चार्ल्स विलकिन्स और हेनरी टामस कोलबुक आदि और भी कई अंग्रेज विद्वानों को संस्कृताध्ययन की ओर रुचि हुई। नई-नई खोज होने लगी; नई-नई पुस्तकें बनने लगीं। फल यह हुआ कि इन गौरांग पण्डितों को संस्कृत के सैकड़ों शब्द ग्रीक आदि योरप की प्राचीन भाषाओं से प्रायः तद्वत् अथवा कुछ फेरफार के साथ मिल गये। इससे इन लोगों के आश्चर्य, कौतूहल और एक प्रकार के आतङ्क का ठिकाना न रहा। अरे इन बहशी हिन्दुस्तानियों की प्राचीन भाषा क्या किसी समय हमारे भी पूर्व-पुरुषों की भाषा थी।