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साहित्य-सीकर

मिलते। खैर। वे दर्शन कहाते हैं। सभी दर्शनों में अध्यात्म-विद्या ही का वर्णन नहीं। वैशेषिक दर्शन में पदार्थ-विज्ञान के सिद्धान्त भरे पड़े हैं। न्याय में तर्क-शास्त्र का विवेचन किया गया है। मीमांसा में धर्म-कर्म संबंधिनी प्राचीन पद्धतियों की व्याख्या है। योग दर्शन में अन्तर्निहित शक्तियों के उद्‌बोधन का वर्णन है। हाँ, शङ्कर और बौद्ध धर्मीय महायान-सम्प्रदाय के लेखकों ने अध्यात्म-विद्या अर्थात् वेदान्त का खूब विवेचन किया है। महायान-सम्प्रदाय के अनुयायियों ने नीति शास्त्र—नैतिक तत्वज्ञान—के भी तत्वों का गहरा विचार किया है।

काव्य और नाटक

प्रत्येक मनुष्य-जाति में काव्य, थोड़ा बहुत अवश्य पाया जाता है। क्योंकि जीवन-कलह से त्रस्त मनुष्य के मन को शान्ति देने में उससे बड़ी सहायता मिलती है। एक देश या जाति-विशेष का काव्य-साहित्य दूसरे देश या जाति विशेष के काव्य-साहित्य से नहीं मिलता। किसी भी जाति में साहित्य का यह अङ्ग उतनी उन्नति को नहीं पहुँच पाया जितनी उन्नति को वह भारतवर्ष में पहुँचा है। किसी में एक बात की कमी है, तो किसी में दूसरी बात की। किसी में संगीत का अभाव है, किसी में नाटक का, किसी में पद्य का। पर प्राचीन भारत के काव्य-साहित्य में किसी बात का अभाव नहीं। गद्य-काव्य, पद्य-काव्य, चित्र-काव्य; उसी तरह दृश्य-काव्य और श्रव्य-काव्य; कहाँ तक गिनावें प्रत्येक प्रकार का काव्य मौजूद है और प्रत्येक बात काव्य से भरी हुई है। रामायण, महाभारत और रघुवंश पौराणिक काव्य के उत्तम नमूने हैं।

नाटक, अलंकार, चम्पू तथा अन्य छोटे-मोटे काव्य ग्रन्थों की तो बात ही जाने दीजिए। जगत्प्रसिद्ध कालिदास का रघुबंश तो दुनिया में अपना सानी नहीं रखता। पुराणों में प्रायः एक, दो अथवा इससे भी