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साहित्य-सीकर

"टाइम्स" का "बायकाट" कर दिया। बहुत दिन बाद लड़-झगड़ आपस में निपटारा हो गया और फिर "टाइम्स" में विज्ञापन छपने लगे। एक बात जो इससे सिद्ध होती है वह यह है कि इँगलैंड के प्रकाशक इतने प्रबल और शक्तिमान हैं कि "टाइम्स" जैसे पत्र की भी वे नाकोदम कर सकते हैं।

बड़े खेद की बात है कि इस देश की भाषाओं में—विशेष करके हिन्दी में—जैसे सुपाठ्य पुस्तकों की कमी है वैसे ही प्रकाशकों की भी कमी है। प्रकाशकों की कमी नही, किन्तु यह कहना चाहिये कि उनका प्रायः अभाव सा है। अच्छी-अच्छी पुस्तकों के न बनने और उनके न प्रकाशित होने के जो कारण हैं उनमें सुयोग्य प्रकाशकों का न होना भी एक कारण है। बाबू दिनेशचंद्र सेन, बी॰ ए॰ ने "बङ्ग भाषाओं साहित्य" नामक एक अद्वितीम ग्रन्थ लिखा है। उसके पहले संस्करण की छपाई इत्यादि का खर्च स्वाधीन त्रिपुरा के अधिपति, महाराज वीरचंद्र माणिक्य, ने दिया। तब वह पुस्तक छपकर प्रकाशित हो सकी। पुस्तक ऐसी उत्तम थी कि एक ही वर्ष में उसका पहला संस्करण बिक गया। गवर्नमेंट ने इस पुस्तक को इतना पसन्द किया कि दिनेश बाबू को २५ रुपया मासिक पेन्शन हो गई। परन्तु इस पुस्तक को लिखने में पुस्तककर्त्ता ने इतना परिश्रम किया कि उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और जिस नौकरी की बदौलत उनकी जीविका चलती थी उससे हाथ धोना पड़ा। फल यह हुआ कि वे रोटियों के लिए मुहताज हो गये और गवर्नमेंट की पेन्शन ही से किसी तरह पेट पालना पड़ा। इस दशा में वे अपने पूर्वोक्त पुस्तक का दूसरा संस्करण न निकाल सके। उस के लिए २००० रुपये दरकार थे। इतना रुपया उनके पास कहाँ? अतएव बहुत दिनों तक उसकी दूसरी आवृत्ति न निकल सकी! अन्त में सन्याल एण्ड कम्पनी ने किसी तरह इस परमोपयोगी ग्रन्थ को प्रकाशित करके उसे सर्वसाधारण के लिए सुलभ कर दिया। अब