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संग्राम का साहित्य


दूकान और पिकेटिग ही की घटना है।एक दुराग्रही मुसलमान की दूकान पर जोरो का पिकेटिंग हो रहा था । सहसा एक मुसलमान सज्जन अपने कुमार पुत्र के साथ कपडा खरीदने आये । सत्याग्रहियो ने हाथ जोडे, पैरों पड़े दूकान के सामने लेट गये; पर खरीदार पर कोई असर न हुा । वह लेटे हुए स्वयंसेवको को रौदता हुआ दूकान मे चला गया। जब कपडे लेकर निकला, तो फिर वालंटियरो को रास्ते मे लेटे पाया। उसने क्रोध मे आकर एक स्वयसेवक के एक ठोकर लगाई। स्वयसेवक के सिर से खून निकल आया । फिर भी वह अपनी जगह से न हिला। कुमार पुत्र दूकान के जीने पर खड़ा यह तमाशा देख रहा था। उसका बाल-हृदय यह अमानुषीय व्यवहार सहन न कर सका। उसने पिता से कहा-बाबा,आप कपडे लौटा दीजिए।

बाप ने कहा-लौटा दूँ ! मै इन सबो की छाती पर से निकल जाऊँगा।

'नहीं,आप लौटा दीजिए !'

'तुम्हे क्या हो गया है ? भला लिये हुए कपड़े लौटा दूँ !'

'जी हाँ!'

'यह कभी नहीं हो सकता।'

'तो फिर मेरी छाती पर पैर रखकर जाइए।'

यह कहता हुआ वह बालक अपने पिता के सामने लेट गया । पिता ने तुरन्त बालक को उठाकर छाती से लगा लिया और कपड़े लौटाकर घर चला गया ।

तीसरी घटना कानपुर नगर की है। एक महाशय अपने पुत्र को स्वयसेवक न बनने देते थे। पुत्र के मन मे देश सेवा का असीम उत्साह था, पर माता-पिता की अवज्ञा न कर सकता था। एक ओर देश-प्रेम था, दूसरी ओर माता-पिता की भक्ति । यह अंतर्द्वन्द्व उसके लिए एक दिन असह्य हो उठा । उसने घर वालों से कुछ न कहा । जाकर रेल की