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अन्तरप्रान्तीय साहित्यिक आदान-प्रदान के लिए

का भोजन आप एक स्वस्थ आदमी को खिला दें, तो शायद थोड़े दिनो मे वह खुद रोगी हो जाय । इगलैड या फ्रास समृद्धि के ऊँचे शिखर पर पहुँच गरे है वे अगर शराब और नाच और कामुकता मे मग्न हो जाये, तो उनके लिए विशेप चिन्ता की बात नही। उनके राष्ट्र-देह मे इन विपी को पचाने की ताकत है । हिन्दुस्तान जो गुलामी के जजीरों मे जकडा हुआ एड़ियों रगड रहा है, उसके लिए वह सभी चीजे त्याज्य और निषिद्ध है जिनसे जीवन-शक्ति क्षीण होती है, जिनसे सयम-शक्ति का द्वास होता है । जो ऑख केवल नग्न चित्र ही मे सौदर्य देखती है, और जो रुचि केवल रति-वर्णन या नग्न-विलास मे ही कवित्व का सबसे ऊँचा विकास देखती है, उसके स्वस्थ होने में हमे सदेह है । यह 'सुन्दर' का आशय न समझने की बरकत है । जो लोग दुनिया को अपनी मुट्ठी मे बन्द किये हुए है, उन्हे दिमागी ऐयाशी का अधिकार हो सकता है । पर जहाँ फाका है और नग्नता है और पराधीनता है, वहाँ का साहित्य अगर नगी कामुकता और निर्लज्ज रति वर्णन पर मुग्ध है, तो उसका यही आशय है कि अभी उसका प्रायश्चित्त पूरा नही हुआ, और शायद दो-चार सदियो तक उसे गुलामी मे और बसर करनी पडेगी।

भारतीय-परिषद् के स्वागताध्यक्ष प्राचार्य काका कालेलकर का भाषण विद्वत्ता-पूर्ण है और इस उद्योग के सभी पहलुओ पर आपने काफी विचार किया है । आपने साहित्य के द्वारा राष्ट्र के एकीकरण की चर्चा करते हुए साम्प्रदायिकता और प्रान्तीयता को देश का महारोग बतलाया, और साहित्य मे इन गलत प्रवृत्तियो को रोकने के लिए नियत्रण की जरूरत बतलाई । आपने इस प्रयास की कठिनाई का अनुमान करते हुए कहा--

'साहित्य को पकड़कर रखना मुश्किल है, बॉध रखना अशक्य है। उसे कायदे के बन्धन में कम-से-कम बाँधना चाहिए । सदाचार और सुरुचि के प्रणेता शिष्ट पुरुषों का अकुश साहित्य के लिए अच्छा है।' लेकिन इसके साथ ही आप यह चेतावनी भी देते है-