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साहित्य का उद्देश्य

दोष नही, परिस्थितियो का दोष है जिनके अन्दर उन कवियो को रहना पड़ा। उस जमाने मे कला दरबारो के आश्रय से जीती थी और कलाविदो को अपने स्वामियो की रुचि का ही लिहाज करना पड़ता था। उर्दू कवियो का भी यही हाल है। यही उस जमाने का रग था । हमारे रईस लोग विलास मे मग्न थे, और प्रेम, विरह और वियोग के सिवा उन्हे कुछ न सूझता था । अगर कहीं जीवन का नकशा है भी, तो यह कि ससार चद-रोजा है, अनित्य है, और यह दुनिया दुःख का भण्डार है और इसे जितनी जल्दी छोड़ दो, उतना ही अच्छा । इस थोथे वैराग्य के सिवा और कुछ नहो । हाँ, सूक्तियो और सुभाषितों की दृष्टि से वह अमूल्य है । उर्दू की कविता आज भी उसी रग पर चली जा रही है, यद्यपि विषय मे थोड़ी-सी गहराई आ गयी है। हिन्दी मे नवीन ने प्राचीन से बिलकुल नाता तोड़ लिया है। और आज की हिन्दी कविता भावों की गहराई, आत्मव्यजना और अनुभूतियों के एतबार से प्राचीन कविता से कहीं बढ़ी हुई है । समय के प्रभाव ने उस पर भी अपना रंग जमाया है और वह प्रायः निराशावाद का रुदन है । यद्यपि कवि उस रुदन से दुःखी नही होता, बल्कि उसने अपने धैर्य और सतोष का दायरा इतना फैला दिया है कि वह बड़े से बड़े दुःख और बाधा का स्वागत करता है । और चूँकि वह उन्हीं भावों को व्यक्त करता है, जो हम सभी के हृदयो मे मौजूद हैं, उसकी कविता में मर्म को स्पर्श करने की अतुल शक्ति है । यह जाहिर है कि अनुभूतियों सबके पास नहीं होती और जहाँ थोड़े-से कवि अपने दिल का दर्द कहते हैं, बहुत से केवल कल्पना के आधार पर चलते हैं।

अगर आप दुःख का विकास चाहते है, तो महादेवी, 'प्रसाद', पंत, सुभद्रा, 'लली', 'द्विज' 'मिलिन्द', 'नवीन', प० माखनलाल चतुर्वेदी आदि कवियो की रचनाएँ पढ़िये । मैंने केवल उन कवियो के नाम दिये हैं, जो मुझे याद आये, नहीं तो और भी ऐसे कई कवि है, जिनकी रचनाएँ पढ़कर आप अपना दिल थाम लेगे, दुःख के स्वर्ग मे पहुँच जायेंगे।