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देशव्यापक भाषा


हैं उनका भी ऊपर ज़िक्र हो चुका है, और एक भाषा होने से जो लाभ हैं उनका भी ज़िक्र हो चुका है। हिन्दी को देशव्यापक भाषा बनाने में कठिनतायें अवश्य उपस्थित होंगी। परन्तु उन का सामना करना उचित है । उनको हल करना उचित है। वे ऐसी नहीं हैं जो उल्लंघनीय न हों। इस देश की अपेक्षा रूस बहुत बड़ा देश है। वहां भी अनेक भाषायें प्रचलित हैं। ऐसे विस्तीर्ण देश में भी, इस समय, एक रशियन भाषा को देशव्यापक बनाने का प्रयत्न हो रहा है और सफलता के पूरे लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इस लिए जब रूस के समान विशाल देश में एक भाषा हो सकती है तब इस देश में भी हो सकती है। रूस में यह विशेषता है कि राजा की भाषा रशियन ही है । यह बात इस देश में नहीं। परन्तु गवर्नमेंट की सहायता के बिना भी, हिन्दी को, हमलोग देश-व्यापक भाषा बना सकते हैं, सफल-मनोरथ होने के लिए एकता की आवश्यकता है, दृढ़ निश्चय की आवश्यकता है, अध्यवसाय की आवश्यकता है । बस इतना ही चाहिए; इतनेही में सब कुछ आ गया । उद्योग करने से सिद्धि हुए बिना नहीं रहती। विलम्ब चाहे हो, परन्तु सिद्धि होती अवश्य है।

देश के मङ्गल के लिए, देश के कल्याण के लिए, देश को सचेतन करने के लिए एक भाषा होने की परमावश्यकता है। जिसने इस देश में जन्म लिया है, जिसने इस देश का अन्न जल ग्रहण किया है, जो इस देश से कुछ भी प्रीति रखता है, उसका धर्म है कि वह इसे सजीव करने के लिए यथाशक्ति प्रयत्न