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देशव्यापक भाषा



नाम लिखने की बहुत ही बड़ी आवश्यकता पड़ने पर वे "वशेशर-परशाद ” और “किकन-सरूप" आदि लिख कर अपनी मातृ-भाषा के प्रेम की पराकाष्ठा दिखलाते हैं ! जिनकी मातृ-भाषा हिन्दी है ; जो अपनी माता से, जो अपनी स्त्री से, जो अपने लड़के लड़कियों से हिन्दी बोलते हैं ; और जो हिन्दी ही में स्वप्न देखते हैं, उनको मानो लजित करने ही के लिए अथवा धिक्कारने ही के लिए, आगरा, इलाहाबाद और बनारस से सैकड़ों कोस दूर दूर बसनेवाले महाराष्ट्र और गुजरात देश के पण्डितों ने हिन्दी की महिमा गाई है ! धन्य उनकी सत्य-प्रीति और उदारता ! और धिक् हिन्दी बोलनेवालों की कृतघ्नता!

पण्डित भास्कर विष्णु फड़के का लेख बहुत उपयोगी है। जिनकी भाषा हिन्दी है उनके लिए वह विशेष उपयोगी है; पढ़ने योग्य है ; मनन करने योग्य है। इसलिए, हम, भास्कर-राव के लेख के आधार पर यह लेख लिख रहे हैं।

देशब्यापक भाषा की आवश्यकता ।

वाणी और अर्थ का जो सम्बन्ध हैं ; जल और तरङ्ग का जो सम्बन्ध है; शरीर और आत्मा का जो सम्बन्ध है-देश और देशत्व का वही सम्बन्ध है। देश का जो धर्म है, देश का जो गुण है, देश का जो भाव है उसीको देशत्व कहते हैं । जिसके बिना देश कोई चीज़ ही नहीं रह जाता वही देशत्व है। आत्मा के बिना शरीर मिट्टी है ; अर्थ के बिना वाणी मिट्टी है; देशत्व के बिना देश भी मिट्टी है। जिस देश से देशत्व निकाल