पृष्ठ:साहित्यलहरी सटीक.djvu/८९

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बल जाहु बाहेर कहा हित ते गौन ॥ दिन दिनन में लगे मानिक सिया रिपु पितु हेर । लाज मानत रहत निसदिन सकत ना मुष फेर ॥ षचर षेलन हेत आवत आप ते सतकोट । नचत हैं सारंग सुंदर करत सब्द अनेक ॥ सबै बज तव हेत देषन चलो आवत लाल। संभुभूषन बदन बिलसत कंज ते गुहि माल ॥ यह उदात अनूप भूषन दियो सब घर तोर। सूर सबरे लच्छनन जुत सहित सब बिन तोर ॥६४ ॥ उक्त जसोदा की कृष्ण प्रति कै हे लाल तुम भानुजा जमुना भवन में षेलो है.(हैं कहे हौं बलजाहु)काहे हे बलि बाहेर कौन हेतते गमन करत हौ दिन नाम बार बार नाम दुआर में जो मानिक तेरे लगे हैं ताके सियारिपु जयंत पिता इंद्र हेर के लाज मानत सामुहे नाही हेर सकत पचर चंग तेरे हेत ते आवत है आप ते कोटनकोट सारंग जो भंवरा है ते नृत करत है अरु शब्द करत है भौंरा पिलौना अरु सब वृज तेरे देषवे के वास्ते चलो आवत है संभूभूषन चंदबदनी कंज करण ते माल गुदिलि आवत है ऐसो उदात अलंकार तेरे घर में है सब लक्षणन जुत-तौ पै सुहित सब त्रिन तोरत है यामें संपति की अधिकता ते अरु जमुना में ग्रह असंभव तीर ते अप्रयोजनवती लच्छन षिलौना आप ते नाही आवत.आन को गुन लयो ताते उपादान भंवर में लछित चंद मुष में गो निसारोपा कंज में सुधा साधव सान ॥९४॥ टुतीरासदिनपति नाही । जहां