पृष्ठ:साहित्यलहरी सटीक.djvu/३६

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[३५] पिय बिन बहत बैरिन बाय । मदन बान कमान आयो करष कोप चढाय॥ दिवसपति सुत मातु बौध विचार प्रथम मिलाय । बान पलटत भानजातट निरष तन मुरझाय ॥ आद को सारंग बैरी पट प्रथम दिषराय । उदित अंगन पै अनोषी देत आग्न जराय ॥ कवन राषनहार बृज बृजराज बिन प्रन भाय । सूरदास सुजान कासो कहो कंठ लगाय ॥ ८६॥ उक्त प्रोषितपतिका नायका सपिन प्रति । व्याघात अलंकार बिरह दसा दुमिलि द्वरावन कूट कर के दिवस पति सूर्य तिन के सुत करण ताके माता कुंती ताको आद को बरन कुं बौध मत कहावै है जैन ताको आद जेन दोनों मिलाय कुनै भई बान नाम सर ताको परजाय नाम ताल ताको पलटे ते लताभई । सो जमुनातट बिषे जब हैं । सारंग भ्रमर ताको बैरी. चंपा ताको आद बरन चपट को नाम दुकूल ताके आद के दोमिलि चंद भयो सो आगि जरावै है अब वृज में कौन राषनहार है । बृजराज बिना अरु कासों कहों कंठ लगा के ॥८६॥ बैठी आजु कुंजन ओर। तकत हैं बृषभाननंदिनि बलित नंदकिसीर ॥ भानुसुत हित सत्रु पित लागत उठत दुष फेर । खै गये सुर सूल सूरज बिरह अस्तत फेर ॥ ३३ ॥ (बैठी है कुंजन की ओर चितवत वृपभाननंदनी नंदकिसोर को तकत हैं। ) भानुसुत करण हित दुरजोधन शत्रु भीम पिता पवन लागे तें दुष होत है सुर कहे सुमन सर (सूल) से हो गए हैं विरह ते तिनकी अस्तुत मुष निन्दा करति इहां सहेट सून ते शिमलबधा अस्तुत मुष तें निन्दा ब्याजअस्तुत अलंकार लच्छन । दोहा-सुन सहेट संकेत ते, विप्रलब्ध ठहराइ । 1 अस्तुत ते निन्दा करै, ब्याज उक्त कबिराइ ॥ १ ॥३३॥ " टिप्पणी-सरदार कवि ने उठत दुष फेर के स्थान पर उडत चुहुंकत हेर लिखा है और अर्थ में, सुन सहेट संकेत ते, के स्थान पर सूनेही संकेत तें, लिखा है।