पृष्ठ:साहित्यलहरी सटीक.djvu/२१८

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[२१७ ] कवि थे इन का बनाया हुवा कृष्ण चंद्रिका नाम ग्रंथ साहित्य में बहुत सुंदर औ हमारे पुस्तकालय में मौजूद है। (११०) दिनेश कवि इन का नखसिख बहुत ही विचित्र है। (१११) दान कवि शंगार में सरस कविताई है। (११२) तोषी कवि। (११३) तेही कवि। (११४) धीरज नरिंद महाराज इंद्रजीत सिंह बुंदेला उडछावाले सं० १६१५ इन्ही महाराज के इहां कवि केशोदास थे औ प्रवीन राइ पातुरी भी इन्ही के सभा में विराजमान थी इन के समय में उड़छा बड़ी राज- धानी थी। * (११७) श्रीगोस्वामी तुलसी दासजी सं० १६०१ ए महाराज सरवरिया ब्राह्मण राजापुर जिले पराग के रहनेवाले प्रायः संवत् १५८३ के करीव उत्पन्न हुए थे औ सं० १६८० में स्वर्गवास हुवा इन के जीवनचरित्र की पुस्तक बेनीमाधोदास कवि पसका ग्रामवासी ने जो इन के साथ साथ रहे हैं बहुत विस्तार पूर्वक लिखी है उस्के देखने से इन महाराज सब चरित्र प्रगट होते हैं इस पुस्तक में ऐसे बिस्तार कथा को हम संक्षेप करिकै वर्णन करें निदान गोसाई जी बड़े महात्मा रामोपासक महा- योगी सिद्ध हो गए हैं इन के बनाए ग्रंथों का ठीक ठीक संख्या हम को मालूम नहीं हुई केवल जे ग्रंथ हमने देखे अथवा हमारे पुस्तकालय में हैं उन का जिकिर किया जाता है प्रथम ४९ कांड रामायण बनाया है इस तफसील से।

  • (११५) श्रीपति कवि का वर्णन पहले हुआ है परंतु वह इस दोहे का

नहीं है। रत्नाकर कवि ने हम से कहा है कि श्रीपति कबि अक्बर बादशाह के नौकर थे परंतु खुशामदी न थे कईएक कवियों ने मिल कर अकबर बादशाह के सामने [करी मिलि आस अकबर की ] समस्या दिये परंतु कबि ने स्पष्ट बादशाह क्रो फटकारा यह कबि भक्त था वह तो कबिता से स्पष्ट ही मालूम हुआ । अब के सुलताँ फुनियान समान हैं बांधत पाग अटब्बर की । तजि एक को दूजो भजे जो कोऊ तब जीभ क वह लम्बर की ॥ सरनागत श्रीपति श्रीपति की नहिं तास जरा कोऊ जब्बर की । 'जिन को नहिं भास कछू हरि की सो करो मिलि आस अकबर की ॥१॥