पृष्ठ:साहित्यलहरी सटीक.djvu/१७६

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

भयो सहाय अंध तकि माग । अहो कीन उपकार न थोरा ॥७॥ बंदहुं बार बार अब तोही । कीन्यो कूप त्रास गत मोही ॥ अब वृतांत निज देहु सुनावा । कहि ते आव कवन कितै जावा ॥८॥ मोह व्यवस अस तासु निहारी । बोले गोप वेस गिरधारी ॥ मथुरा बसहुं गोपसुत भय्या । आवा बिपुन चरन हितगय्या ॥ ९॥ तोरे देखि भक्त दृग हीना । उहां निवरन कूप चुत कीना ॥ अब तुम जाहु सदन सुखमाना । मै इत करहुं बिपन निजप्याना ॥१०॥ दोहा-अस कहि बतसल भक्तप्रभु , कृष्ण दलन दुख क्रूर । द्रमन ओट करुनायतन , गए कछुक जब दूर ॥१॥ . चौपाई। तब दरसन हित सूर सुजाना । पाछिल चल्यो बेग अकुलाना ॥ गवन्यो कहां बाल मृदु अंगा। हरण ललित छबि कोटि अनंगा ॥२॥ इतउत फिरहिं बिथत मन माहीं । आवत दृष्टि बाल प्रभ नाहीं॥ अति से कलेस सूर तब पावा । पूछत पथक देखि जित आवा ॥२॥ को अस बरन स्याम मृदु चारू । बेत्रपानि गय्यन चरवार ॥ कामर कंध्र माल बन सोहा । देखा तुमहु बाल मन मोहा ॥३॥ सुनितहि कथन पथिक इहि भांती। इह कस कहत कवन तोहि भ्रांती ।। इहां न काउ धेन बनचारी । जाहु सजन निज सदन सिधारी ॥४॥ सूर सुनत अस पथक बखाना । आगल चल्यो बिपन बिसमाना॥ खोजत नील जलधवत बरना । गोपवाल कानन मन हरना ॥५॥ भ्रमत भ्रमत दारुन स्त्रम पाया । बैठ्यो अंत बिथत द्रुगछाया ॥ तोलो दुन्यो सूर निसि छायो । भक्त सूर ब्याकुल उठि धायो ॥६॥ जहं तह लग्यो भ्रमन बन माहीं। खोजत गोपवाल मृदुकाहीं॥ गति अनन्न अस भक्त जडाना । भा तदरूप कृष्ण भगवाना ॥७॥ पावन भक्ति प्रीति मन माहीं । तजिन जाहि कानन पुर काहों ।।... तब निसि स्वपन रूप मृद सोई। देखे दिवस गोपसुत जोई ॥८॥ मंदहास जुत भक्त सहय्या । बोले बदन बचन सुख दय्या ॥ इहां न भक्त गोपसुत कोई । मेहुं कीन कौतुक कल सोई ॥९॥ कीन्यो तुमहिं कप चुत वारन । बनत गोप बन गय्यन चारन ॥ ज्योति विमल तुव दृगन प्रकासा। भक्त सृष्ट सब मोर बिलासा ॥१०॥ तुव नयनन इन लीन निहारी । मोर, सरूप भक्त ब्रतधारी ।।.