पृष्ठ:साहित्यलहरी सटीक.djvu/१०६

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[ १०५] द्रग करे हैं धनु उपमेय भू सो उमेठी है भूषन बाजू ताको नाम अंगद ताके पिता बालि (ताके) पिता इंद्र सुत जयंत रिपु राम पतनी जानकी माता भूम अर्थ मम की वोर देपत है पचर पिलोना गुड्डीताको हित नष सिंगार (सिर) पान नाम हाथ जंग मन चरन पै धरे हैं अर्थ कर के नप तें पग को नष लिङ्ग है वासब इंद्र सुत अर्जुन रिषु करन सुभाव सपी अर्थ सपिन का बात सुनत है पर विथक पवन सुतं भीम प्राता करन पिता सूर्य पतनी संज्ञा भी नाही करत तहां जब बृजचद आए तब काहू की रोकी न रही स्याम परवारन गई जेसे चकचकई यह शंगार को अंग सांत भाव है ताते सामाहित अलंकार ॥ ११२॥ टिप्पणी-सरदार कवि ने इस पद को भी दूसरे स्थान पर रखकर कुछ घटा बढ़ाकर अर्थ किया है वह नीचे प्रकाश किया जाता है मूल में अंतर नहीं है अतएव मूल नहीं लिखा है केवल अर्थ लिखा है। ____ उक्ति सपी प्रति सपी की। कै आजु बैठी है ।। मानिक लाल नेत्र धनु उपमेय भोह उमेठे। भूषन अंगद पिता पिता इंद्र मुत जयंत रिपु राम पतनी माता भूमि देषत ॥ पचर पिलोना हित नष सिर धरे नप लिषत है । वासब सुत रिपु करन मुभाव सषी की बात नाहीं सुनत । विथक पुत्र भीम भ्राता करन पितु सूर्य पतनी संज्ञा नाही करत । सो कृष्ण देषि रोकिन रही इहां शंगार को अंग सांत भाव तें समाहित अलंकार ।। ४७ ॥ सजनी हो न स्याम भुष हेरों। सूर सुतापित राग गंध पितु प्रिय जुत आदि सकेरो। मुष समूह मानुष ताही विध करो न कबहूं फेरी। पै निरजर रिसनी को कबहूं सबदन सुंदर पेरो॥ ना जानों अनुराग कहातें मोहि घनेपन घेरी ॥ भूषनपतिअहारसुतबैरी बारत अंग उजेरी । पलटत बान भानुजातट में