पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/९१

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पवित्रता घासों के जङ्गल, किस तरह देखे कोई ? हिमालय की बर्फ हो शुद्ध सफेद और मेरा मन काला ! हरी २ घास भी हो नरम और मेरा दिल हो कठोर ! पत्थर, रेत, कुशा, जल ये भी हों पवित्र, पर उन जैसी भी न हो मेरी स्थिति ? फूल भी हो सुगन्धित, मिट्टी भी सुगन्धित पर मेरे नेत्र और बाणी और अन्य अङ्ग हों दुर्गन्धित ? पत्थरों के पहाड़, पानी के झरनों को देखकर तौ महर्षि भी बोल उठे “सर्व खल्विदं ब्रह्म' पर मुझे देख उसको भी कभी २ शक हो जावे और प्रश्न उसके हृदय में भी उठे कि ब्रह्म को कैसे भूल गया ? ऐसे कैसे निभैगी -हाय मुझमें यह अपवित्रता कहाँ से आ गई ! क्यों या गई ! ब्रह्म को भी कलंकित कर रही है। ब्रह्मकान्ति की अटल शोभा को भी एक ज़रा से बादल ने ढाँप दिया। एक मोतियाविंद के दाने ने गुप्त कर दिया । अपवित्रता को आँखों में रख कैसे हो सकता है वह विद्यादर्शन ? कैसे सफल हो मनुष्यजन्म राजदुलारे! अहो क्या हुआ कि सारी की सारी सलतनत राज्य छूट गया, दर दर गली गली धक्के खाता हूँ; कोई लात मारता है, कोई ढेला, कभी यहां चोट लगती है, कभी वहाँ, कभी इस रोग ने मारा, कभी उस रोग ने मारा । सारा दिन और सारी रात रोग के पलंग पर भी पड़ा रहना क्या जीवन हुआ । मरने से पहले ही हजार बार मौत के डर से मरते रहना भी क्या जीवन है ? सदा अाशा तृष्णा के जाल में फड़क २ न जीना और न मरना, भला जी क्या सुख हुआ ? कौन सा कलियुग मेरे मन में भूत की तरह आ समाया है कि मुझे सब कुछ भुला दिया । खुश हो २ कर जुआ खेलने लग गया। अपनी आत्मा को भी हार बैठा । अपनी आँखें आप ही फोड़ अब रोते हो क्यों ? अब तो तुम्हारी प्रार्थना सुननेवाला कोई नहीं। इस अपवित्रता के अँधेरे को जैसे तैसे सफेद करना है। इस कलङ्क को धोना है । इस मोतियाविन्द को निकलवाना है । मैं भारतनिवासी कैसे हो सक्ता सकता u ६१