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भट्टिकाव्य

दिखाने के लिए, दसवें सर्ग में, बीस-इक्कीस श्लोक केवल यमक-बद्ध लिख डाले हैं। उनमें से प्रत्येक श्लोक में भिन्न भिन्न प्रकार के यमक के उदाहरण हैं। गर्भ-यमक, सर्व-यमक, महा-यमक आदि किसी भी यमक को प्रायः उसने नहीं छोड़ा। नीचे भट्टि महाराज के चक्रवाल-यमक का नमूना देखिए―

अवसितं हसितं प्रसितं मुदा
विलसितं ह्रसितं स्मरभाषितम्।
न समदा:प्रमदा हतसंमदाः
पुरहितं विहितं न समीहितम्॥

इसे आप शब्दाडम्बर-मात्र न समझ लीजिएगा। यह सर्वथा सार्थक और भावपूर्ण है; यह बात संस्कृतज्ञों के ध्यान में तत्काल आ जायगी। महायमक के उदाहरण में इस कवि ने एक श्लोक ऐसा लिखा है जिससे राम का भी अर्थ निकलता है और पर्वत का भी। यथा―

अभियातावरं तुङ्गं भूभृतं रुचिरं पुनः।
कर्कशं प्रथितं धाम ससत्वं पुष्करेक्षणम्॥

अन्य लक्षण-ग्रन्थों की तरह दीपक, रूपक और उपमा के बहुत से भेद दिखा कर कवि ने शेष अलंकारों के निदर्शन के लिए प्रायः एक ही एक उदाहरण दिया है। इस कवि की कोई कोई उपमा बड़ी ही अनूठी है। सीताहरण के लिए जब रावण उनके पास आया तब कवि को एक बड़ी ही मनोहारिणी उपमा सूझी। उसने लिखा―

प्रगृह्यपद्वत्-साध्वीं स्पष्टरूपामविक्रियाम्ँँ।
अगृह्यां वीतकामत्वाद् देवगृह्यामनिन्दिताम्॥