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भट्टिकाव्य

उग्रंपश्येन सुग्रीवस्तेन भ्राता निराकृतः।
तस्य मित्रीयतो दूतः सम्प्राप्तोऽस्मि वशंवदः॥

संस्कृत-व्याकरण में एक प्रत्यय का नाम 'इष्णुच्' है। हिन्दी के सहिष्णु आदि शब्द उसो की बदौलत अस्तित्व में आये हैं। उनका एक यूथ का यूथ पाँचवें सर्ग के पहले ही श्लोक में विचरण कर रहा है। देख लीजिए―

निराकरिष्णू वर्तिष्णू वधिष्णु परितो रणम्।
उत्पतिष्णू सहिष्णू च चेरतुः खरदूषणौ॥

यदि आप एक ही प्रकार के कुछ प्रत्ययों का एकत्र प्रयोग देखना चाहें तो भट्टिकाव्य के सातवे सर्ग का यह श्लोक देखिए―

सृमरो भङ्गुरप्रज्ञो गृहीत्वा भासुरं धनुः।
विदुरो जित्वरःप्राप लक्ष्मणो गत्वरान् कपीन्॥

यह छोटा सा अनुष्टुप् छन्द है। पर इसी ३२ अक्षरों के छन्द में कवि ने क्रमशः क्यरच्, धुरच्, कुरच् और क्करप् इन इतने प्रत्ययों के प्रयोग दिखा दिये हैं। उसने व्याकरण के निपातित प्रयोगों तक को दिखाने में कसर नहीं की। उन्हें उसने नाचीज़ या मामूली चीज़ समझ कर छोड़ नहीं दिया। चौथे सर्ग के तेरहवें श्लोक में ये प्रयोग नीचे देखिए―

परेद्यव्यद्य पूर्वेद्युरन्येद्यश्चापि चिन्तयन्।
वृद्धिक्षयो मुनीन्द्राणां प्रियं भावुकतामगात्॥

कवि ने व्याकरण के अत्यन्त अल्प महत्त्व तक के विषयों को भी, प्रयोग-निदर्शन-द्वारा, व्यक्त करने का प्रयास उठाया है। उसने अव्ययीभाव-समास की बानगी, पूर्वोद्धृत श्लोक के ठीक आगे ही, दिखाई है। यथा―

आतिष्ठद्गुजपन् सन्ध्यां प्रकान्तामायतीगवम्।
प्रातस्तरां पतत्रिभ्यः प्रबुद्धः प्रणमन् रविम्॥