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मुंशी देवीप्रसाद जी ने इसे ग़लत ठहराया है। इस विषय में उनका जो लेख अगस्त १९११ की सरस्वती में निकला है उसमें उन्होंने इस पर अच्छी तरह विचार किया है। उनके पास इस दशमस्कन्ध की एक कापी, फारसी-अक्षरों में, है। उसमें लिखा है---

"संवत् सतरे से हते चार अधिक चालीस"

इसके अनुसार यह पुस्तक १७४४ में बनी थी। मुन्शी जी की कापी शुद्ध और सम्पूर्ण है। उसमें भूपति ने अपना नाम-धाम, जाति-पाँति, रहने का स्थान आदि सब लिख दिया है। उससे जो नमूने मुन्शी जी ने दिये हैं उनकी भाषा साफ कह रही है कि वह ६०० वर्ष की पुरानी नहीं। संवत् में हेर-फेर लेखकों के प्रमाद से हुआ जान पड़ता है। उसकी मूल प्रति में--"संवत् सतरह शै" रहा होगा। नक़ल करते समय किसी प्रति में 'सतरह' का 'स' भूल से रह गया होगा और 'त' पर 'ए' की मात्रा लग गई होगी। इस तरह 'सतरह' का तेरह' हो गया होगा। यदि यह अनुमान ठीक है तो भूपति की रामायण तुलसीदास की रामायण से पुरानी नहीं। अतएव उसकी प्राप्ति कोई विशेष उल्लेख-योग्य बात नहीं। रिपोर्ट के सम्पादक इन बातों को औरों की अपेक्षा अधिक समझ सकते हैं। यदि वे इस विषय पर विचार करके भूपति के समय का निश्चय कर देते तो बहुत अच्छा होता।

रिपोर्ट में कहीं कहीं छापे की भूलें रह गई हैं। पृष्ठ ८९ पर Asothar का Asotha छप गया है। प्राच्यदेश के नाम रोमन लिपि में लिखने के जो नियम हैं उनका भी ठीक ठीक अनुसरण नहीं किया गया। पृष्ठ ३३२ में 'Debi Prasad' है; पर आगे पृष्ठ ३२४ में---'Debi Prasada' छप गया है।

[ जून १९१३ ]