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रीडरों में ब्राकेटबन्दी

पढ़नेवाले हिन्दुओं के लड़कों को घर पर भी संस्कृत की नहीं, तो हिन्दी की, धार्मिक तथा अन्य पुस्तकें पढ़नी पड़ती हैं। इसी तरह मुसलमानों के लड़कों को भी करना पड़ता है। फिर हमारी समझ में यह नहीं आता कि प्राइमरी मदरसों में पढ़नेवाले लड़कों को एक ही साँचे में ढली हुई भाषा से एक सा लाभ कैसे हो सकता है। क्योंकि दोनों की प्रवृत्ति और दोनों के उद्देश अलग अलग होते हैं। इस विषय में गवर्नमेंट की वर्तमान नीति कुछ समझ में नहीं आती। किसी ने ठीक कहा है--

वेश्याङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा।

इस सम्बन्ध में जस्टिस टी० सी० पिगट की न्याय-परता की प्रशंसा किये बिना हम नहीं रह सकते। हिन्दी और उर्दू के विषय में जो राय शिक्षित हिन्दुओं की है वही आपकी भी है। आपकी राय का सारांश नीचे दिया जाता है----

नागरी लिपि में छपी हुई पुस्तकों और समाचार-पत्रों की भाषा---चाहे आप उसे साहित्य को हिन्दी कहिए, चाहे कुछ और---फारसी लिपि में छपी हुई पुस्तकों और समाचारपत्रों की भाषा से बिलकुल जुदा है। इस भेद-भाव को जान बूझ कर न देखने या उस पर ख़ाक डालने से काम नहीं चल सकता। ऐसा करना फ़िजूल है। अतएव यह बहुत जरूरी है कि डाक्टर सुन्दरलाल की सम्मति के अनुसार रीडरों में परिवर्तन किया जाय। यदि ऐसा न किया जायगा तो जो लड़के चौथा दरजा पासकर के मिडिल स्कूलों के पाँचवे दरजे में भर्ती होंगे उनकी पढ़ाई में थोड़ी बहुत बाधा ज़रूर आवेगी। यहाँ मतलब उन लड़कों से है जिनकी शिक्षा अपर प्राइमरी दरजों में नागरी लिपि के द्वारा हुई होगी। जो लड़के चौथे ही दरजे से मदसा छोड़ देंगे वे यदि मदरसा छोड़ने पर छोटी मोटी किताबें और अख़बार भी न समझ